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बृहदारण्यकोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)

Brihadaranyaka Upanishad with Shankara Bhashya

आदि शङ्कराचार्य द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished1,402 पृष्ठ

४३८ | बृहदारण्यकोपनिषद् | [ अध्याय २

४३८बृहदारण्यकोपनिषद्[ अध्याय २

| च प्रसिद्धवदनुवादाद् अवयवोपमार्थयोश्चात्रासम्भवात् पारिशेष्यात्प्रायार्थतैव। तस्मात्संकल्पविकल्पाद्यात्मकमन्तःकरणं तन्मय इत्येतत्। पुरुषः पुरि शयनात्। | श्रुतियोंमें 'यह' इस प्रकार विज्ञानमयका प्रसिद्धवत् अनुवाद करनेसे तथा [ जीव विज्ञानका अवयव या विज्ञानसदृश है—इस प्रकार ] अवयव और उपमारूप अर्थ सम्भव न होनेसे परिशेषतः इसकी प्रायार्थता ही सिद्ध होती है। अतः संकल्प-विकल्पादिरूप अन्तःकरण विज्ञान है, तन्मय आत्मा है—ऐसा इसका भावार्थ है। पुरमें ( शरीररूप नगरमें ) शयन करनेके कारण वह 'पुरुष' है। | | कैष तदाभूदिति प्रश्नः स्वभावविजिज्ञापयिषया—प्राक्प्रतिबोधात्क्रियाकारकफलविपरीतस्वभाव आत्मेति कार्याभावेन दिदर्शयिषितम्; न हि प्राक्प्रतिबोधात्कर्मादिकार्यं सुखादि किञ्चन गृह्यते; तस्मादकर्मप्रयुक्तत्वात्तथास्वाभाव्यमेवात्मनोऽवगम्यते—यस्मिन्स्वाभाव्येऽभूत्, यतश्च स्वाभाव्यात्प्रच्युतः संसारी स्वभावविलक्षण इति—एतद्विवक्षया | उस समय यह कहाँ था ?—यह प्रश्न आत्माके स्वभाव (स्वरूप) का विशेषरूपसे बोध करानेकी इच्छासे है—जागनेसे पहले आत्मा क्रिया-कारक-फलरूपतासे विपरीत स्वभाववाला है—यह उसके कार्याभावसे दिखाना अभीष्ट है; क्योंकि जागनेसे पहले कर्मादिका कार्य सुख आदि कुछ भी ग्रहण नहीं किया जाता। अतः अकर्मप्रयुक्त होनेके कारण आत्माकी अकर्मस्वभावता ज्ञात होती है—जिस स्वभाववालेमें यह था और जिस स्वभाववालेसे च्युत होकर यह संसारी और भिन्नस्वभाव होता है—यह बतानेकी इच्छासे, जिसमें प्रतिभा- |

ब्राह्मण १] शाङ्करभाष्यार्थ ४३९

ब्राह्मण १] शाङ्करभाष्यार्थ ४३९

| पृच्छति गार्ग्यं प्रतिभानरहितं बुद्धिव्युत्पादनाय । <br><br> क्वौष तदाभूत् ? कुत एतदागात् इत्येतदुभयं गार्ग्येणैव प्रष्टव्यमासीत्, तथापि गार्ग्येण न पृष्टमिति नोदास्ते अजातशत्रुः, बोधयितव्य एवेति प्रवर्तते । ज्ञापयिष्याम्येवेति प्रतिज्ञातत्वात् । <br><br> एवमसौ व्युत्पाद्यमानोऽपि गार्ग्यो यत्रैष आत्माभूत्प्राक्प्रतिबोधाद् यतश्चैतदागमनमागात् तदुभयं न व्युत्पेदे वक्तुं वा प्रष्टुं वा गार्ग्यो ह न मेने न ज्ञातवान् ॥ १६ ॥ | की कमी जान पड़ती है, उस गार्ग्यसे उसकी बुद्धिको व्युत्पन्न (सूक्ष्म विचार-शक्तिसे युक्त) करनेके लिये राजा अजातशत्रु पूछता है । <br><br> 'उस समय यह कहाँ था ? और यह कहाँसे आया है' ये दोनों प्रश्न गार्ग्यको ही पूछने चाहिये थे; किंतु गार्ग्यने इन्हें नहीं पूछा, इससे अजातशत्रुने उदासीन भाव धारण नहीं किया; अपितु यह निश्चय करके कि इसे बोध कराना ही है, वह स्वयं प्रवृत्त हो गया; क्योंकि उसने 'बोध कराऊँगा ही', ऐसी प्रतिज्ञा की थी । <br><br> इस प्रकार सचेत करनेपर भी 'जहाँ यह आत्मा जागनेसे पहले था और जहाँसे इसने आगमन किया है' इन दोनों बातोंको गार्ग्य न समझ सका अर्थात् इन्हें बतलाने या पूछनेका उसे ज्ञान नहीं हुआ ॥ १६ ॥ |

विज्ञानात्माके शयनस्थानका प्रतिपादन तथा स्वपितिशब्दका निर्वचन

स होवाचाजातशत्रुर्यत्रैष एतत्सुप्तोऽभूद्य एष विज्ञानमयः पुरुषस्तदेषां प्राणानां विज्ञानेन विज्ञानमादाय य एषोऽन्तर्हृदय आकाशस्तस्मिञ्छेते तानि यदा गृह्णात्यथ हैतत्पुरुषः स्वपिति नाम तद्गृहीत एव प्राणो भवति गृहीता वाग्गृहीतं चक्षुर्गृहीतं श्रोत्रं गृहीतं मनः ॥ १७ ॥

४४० | बृहदारण्यकोपनिषद् | [अध्याय २

४४०बृहदारण्यकोपनिषद्[अध्याय २

उस अजातशत्रुने कहा, 'यह जो विज्ञानमय पुरुष है, जब यह सोया हुआ था, उस समय यह विज्ञानके द्वारा इन प्राणोंके विज्ञानको ग्रहण कर यह जो हृदयके भीतर आकाश है उसमें शयन करता है। जिस समय यह उन विज्ञानोंको ग्रहण कर लेता है, उस समय इस पुरुषका 'स्वपिति' नाम होता है। उस समय प्राण गृहीत रहता है, वाक् गृहीत रहती है, चक्षु गृहीत रहता है, श्रोत्र गृहीत रहता है और मन भी गृहीत रहता है' ॥ १७॥

संस्कृतहिन्दी
स होवाचाजातशत्रुर्विवक्षितार्थ-समर्पणाय—यत्रैष एतत्सुप्तोऽभूदेष विज्ञानमयः पुरुषः क्वैष तदा-भूत् ? कुत एतदागात् ? इति यदपृच्छाम, तच्छृणूच्यमानम्- —उस अजातशत्रुने विवक्षित अर्थ-को समर्पण करनेके लिये कहा—यह जो विज्ञानमय पुरुष है; जिस समय यह सोया हुआ था उस समय यह कहाँ था और कहाँसे यह आया है?—इस प्रकार जो हमने पूछा था उसका उत्तर दिया जाता है, सुनो—
यत्रैष एतत् सुप्तोऽभूत्तदा तस्मिन्काले एषां वागादीनां प्राणानां विज्ञानेनान्तःकरणगताभिव्यक्ति-विशेषविज्ञानेन उपाधिस्वभाव-जनितेन आदाय विज्ञानं वागा-दीनां स्वस्वविषयगतसामर्थ्यं गृहीत्वा, य एषोऽन्तर्मध्य हृदये हृदयस्याकाशः, य आकाशशब्देन पर एव स्व आत्मोच्यते, तस्मि-न्स्वे आत्मन्याकाशे शेते स्वाभा-विकेऽसांसारिके । न केवल आकाश एव, श्रुत्यन्तरसामर्थ्यात्—जिस समय यह सोया हुआ था, उस समय अन्तःकरणरूप उपाधिके स्वभावसे जनित विज्ञानसे यानी अन्तःकरणगत अभिव्यक्ति (आभास)-विशेषरूप विज्ञानसे वागादिके विज्ञानको अर्थात् अपने-अपने विषयों-में उनके सामर्थ्यको ग्रहणकर यह जो हृदयान्तर्गत—हृदयके मध्य-में आकाश है, जो 'आकाश' शब्दसे अपना परम आत्मा ही कहा गया है, उस स्वाभाविक असांसारिक स्वात्माकाशमें ही शयन करता है। "हे सौम्य ! उस समय यह सत्को ही प्राप्त हो जाता है" इस अन्य श्रुतिकी सामर्थ्यसे

| ब्राह्मण १ ] | शाङ्करभाष्यार्थ | ४४१ |

ब्राह्मण १ ]शाङ्करभाष्यार्थ४४१
शाङ्करभाष्यभाष्यार्थ
“सता सोम्य तदा सम्पन्नो भवति” (छा० उ० ६।८।१) इति। लिङ्गोपाधिसम्बन्धकृतं विशेषात्मस्वरूपमुत्सृज्य अविशेषे स्वाभाविके आत्मन्येव केवले वर्तते इत्यभिप्रायः।केवल भूताकाशमें ही शयन नहीं करता। तात्पर्य यह है कि लिङ्गोपाधिके सम्बन्धसे होनेवाले अपने विशेष रूपको त्यागकर स्वाभाविक अविशेष शुद्ध आत्मामें ही विद्यमान रहता है।
यदा शरीरेन्द्रियाध्यक्षतामुत्सृजति, तदासौ स्वात्मनि वर्तत इति कथमवगम्यते ? नामप्रसिद्ध्या। कासौ नामप्रसिद्धिः? इत्याह—तानि वागादेर्विज्ञानानि यदा यस्मिन्काले गृह्णात्यादत्ते अथ तदा हैतत्पुरुषः स्वपिति नाम—एतन्नामास्य पुरुषस्य तदा प्रसिद्धं भवति। गौणमेवास्य नाम भवति स्वमेवात्मानमपीत्यपिगच्छतीति स्वपितीत्युच्यते।जिस समय यह शरीर और इन्द्रियोंकी अध्यक्षता छोड़ देता है, उस समय स्वात्मामें ही विद्यमान रहता है, यह कैसे जाना जाता है ? —नामकी प्रसिद्धिसे। वह नामकी प्रसिद्धि क्या है ? सो श्रुति बतलाती है—जिस समय यह उन वागादिके विज्ञानोंको ग्रहण कर लेता है, उस समय यह पुरुष 'स्वपिति' नामवाला होता है—उस समय इस पुरुषका यही नाम प्रसिद्ध होता है। यह इसका गुणजनित ही नाम है। यह स्व अर्थात् आत्माको ही अपीति—अपिगच्छति अर्थात् प्राप्त हो जाता है, इसलिये 'स्वपिति' ऐसा कहा जाता है।
सत्यं स्वपितीतिनामप्रसिद्ध्या आत्मनः संसारधर्मविलक्षणं रूपमवगम्यते, न त्वत्र युक्तिरस्तीत्याशङ्क्याह—तत्तत्र स्वापकालेसचमुच, 'स्वपिति' इस नामकी प्रसिद्धिसे तो आत्माका रूप सांसारिक धर्मोंसे विलक्षण जान पड़ता है—परंतु इसमें कोई युक्ति नहीं है—ऐसी आशङ्का करके श्रुति कहती है—उस समय—उस सुषुप्ति-कालमें प्राण

४४२ | बृहदारण्यकोपनिषद् | [ अध्याय २

४४२बृहदारण्यकोपनिषद्[ अध्याय २

| गृहीत एवं प्राणो भवति। प्राण इति घ्राणेन्द्रियम्, वागादिप्रकरणात्; वागादिसम्बन्धे हि सति तदुपाधित्वादस्य संसारधर्मित्वं लक्ष्यते। वागादयश्चोपसंहृता एव तदा तेन। कथम् ? गृहीता वाग्गृहीतं चक्षुर्गृहीतं श्रोत्रं गृहीतं मनः। तस्मादुपसंहृतेषु वागादिषु क्रियाकारकफलात्मताभावात्स्वात्मस्थ एवात्मा भवतीत्यवगम्यते॥१७॥ | गृहीत ही हो जाता है। यहाँ वागादिका प्रकरण होनेसे 'प्राण' शब्दसे घ्राणेन्द्रिय समझना चाहिये; क्योंकि वागादिका सम्बन्ध होनेपर ही उनकी उपाधिसे युक्त होनेके कारण इसका संसारधर्मयुक्त होना देखा जाता है। उस समय उन वागादिका वह उपसंहार ही कर लेता है। किस प्रकार ? उस समय वाक् गृहीत रहती है, चक्षु गृहीत रहता है, श्रोत्र गृहीत रहता है। और मन भी गृहीत रहता है अतः यह ज्ञात होता है कि वागादि इन्द्रियोंका उपसंहार हो जानेपर क्रिया, कारक और फल-रूपताका अभाव हो जानेसे आत्मा अपने स्वरूपमें ही स्थित हो जाता है॥१७॥ |

स्वप्नवृत्तिका स्वरूप

| ननु दर्शनलक्षणायां स्वप्नावस्थायां कार्यकारणवियोगेऽपि संसारधर्मित्वमस्य दृश्यते। यथा च जागरिते सुखी दुःखी बन्धुवियुक्तः शोचति मुह्यते च; तस्माच्छोकमोहधर्मवानेवायम्। | पूर्व०—किंतु दर्शनरूपा स्वप्नावस्थामें तो शरीर और इन्द्रियोंका अभाव होनेपर भी इसकी संसारधर्मता देखी जाती है। जिस प्रकार यह जागरित-अवस्था में होता है, उसी प्रकार स्वप्नमें भी सुखी, दुःखी और बन्धुओंसे वियुक्त होता है तथा शोक करता और मोहित होता है; इसलिये यह शोक-मोहरूप धर्मोंवाला ही है। |

ब्राह्मण १ ] शाङ्करभाष्यार्थे ४४३

ब्राह्मण १ ] शाङ्करभाष्यार्थे ४४३


| नास्य शोकमोहादयः सुखदुःखा-<br>दयश्च कार्यकारणसंयोगजनित-<br>भ्रान्त्याध्यारोपिता इति ।<br>न; मृषात्वात् । | इसके शोक-मोहादि तथा सुख-<br>दुःखादि देह और इन्द्रियोंके संयोगसे<br>होनेवाली भ्रान्तिसे आरोपित नहीं<br>हैं।<br>सिद्धान्ती-ऐसी बात नहीं है;<br>क्योंकि स्वप्न मिथ्या होता है। |

स यत्रैतत्स्वप्न्यया चरति ते हास्य लोकास्तदु-<br>तेव महाराजो भवत्युतेव महाब्राह्मण उतेवोच्चावचं<br>निगच्छति स यथा महाराजो जानपदान्गृहीत्वा स्वे<br>जनपदे यथाकामं परिवर्तेतैवमेवैष एतत्प्राणान्गृहीत्वा<br>स्वे शरीरे यथाकामं परिवर्तते ॥ १८ ॥

जिस समय यह आत्मा स्वप्नवृत्तिसे बर्तता है उस समय इसके वे लोक ( कर्मफल ) उदित होते हैं। वहाँ भी यह महाराज होता है या महाब्राह्मण होता है अथवा ऊँची-नीची [ गतियों ] को प्राप्त होता है। जिस प्रकार कोई महाराज अपने प्रजाजनोंको लेकर ( स्वाधीन कर ) अपने देशमें यथेच्छ विचरता है, उसी प्रकार यह प्राणोंको ग्रहणकर अपने शरीरमें यथेच्छ विचरता है ॥ १८ ॥

| स प्रकृत आत्मा यत्र यस्मि-<br>न्काले दर्शनलक्षणया स्वप्न्यया<br>स्वप्नवृत्त्या चरति वर्तते तदा ते<br>हास्य लोकाः कर्मफलानि । के<br>ते ? तत्तत्रोतापि महाराज इव<br>भवति। सोऽयं महाराजत्वमिवास्य<br>लोकः, न महाराजत्वमेव जाग-<br>रित इव । तथा महाब्राह्मण इव, | वह प्रकृत आत्मा जिस समय<br>दर्शनरूपा स्वप्नवृत्तिसे बर्तता है,उस<br>समय उसके वे लोक—कर्मफल<br>उदित होते हैं वे कौन ? तब-उस<br>अवस्थामें भी वह महाराज-सा हो<br>जाता है। उसका वह लोक ( कर्म-<br>फल) महाराजत्वके समान होता है,<br>जागरित अवस्थाकी तरह महाराजत्व<br>ही नहीं होता। इसी प्रकार महा-<br>ब्राह्मणके समान होता है, अथवा |

४४४ | बृहदारण्यकोपनिषद् | [अध्याय २

४४४बृहदारण्यकोपनिषद्[अध्याय २

| उताप्युच्चावचमुच्चं च देवत्वाद्यवचं च तिर्यक्त्वादि, उच्चमिवावचमिव च निगच्छति। मृषैव महाराजत्वादयोऽस्य लोकाः, इव-शब्दप्रयोगाद् व्यभिचारदर्शनाच्च। तस्मान्न बन्धुवियोगादिजनितशोकमोहादिभिः स्वप्ने सम्बध्यत एव। | ऊँची-नीची—ऊँची देवत्वादि और नीची तिर्यक्तत्वादि, इस प्रकार ऊँची-नीचीके सदृश [ गतियों ] को प्राप्त होता है। किंतु इसके ये महाराजत्वादि लोक मिथ्या ही हैं; क्योंकि इनके साथ 'इव' शब्दका प्रयोग किया गया है और [ स्वप्नेतर अवस्थाओंमें ] इनका व्यभिचार (त्याग) भी देखा जाता है। इसलिये स्वप्नावस्थामें बन्धुवियोगादिजनित शोक-मोहादिसे सम्बन्ध होता ही हो—ऐसी बात नहीं है। | | ननु च यथा जागरिते जाग्रत्कालाव्यभिचारिणो लोकाः, एवं स्वप्नेऽपि तेऽस्य महाराजत्वादयो लोकाः स्वप्नकालभाविनः स्वप्नकालाव्यभिचारिण आत्मभूता एव, न त्वविद्याध्यारोपिता इति। | पूर्व०-किंतु जिस प्रकार जागरित अवस्थाके कर्मफल जाग्रत्-कालमें व्यभिचरित होनेवाले नहीं होते, उसी प्रकार वे स्वप्नकालमें होनेवाले कर्मफल स्वप्नकालमें अव्यभिचारी और आत्मस्वरूप ही होते हैं; वे अविद्यासे आरोपित नहीं होते। | | ननु च जाग्रत्कार्यकरणात्मत्वं देवतात्मत्वं चाविद्याध्यारोपितं न परमार्थत इति व्यतिरिक्तविज्ञानमयात्मप्रदर्शनेन प्रदर्शितम्। | सिद्धान्ती-परंतु जाग्रत्कालका भी देहेन्द्रियात्मत्व और देवतात्मत्व अविद्यासे आरोपित ही है, परमार्थतः नहीं है—यह बात विज्ञानमय आत्माको प्राणादिव्यतिरिक्त प्रदर्शित करके दिखा दी गयी है। ऐसी |

| ब्राह्मण १ ] | शाङ्करभाष्यार्थ | ४४५ |

ब्राह्मण १ ]शाङ्करभाष्यार्थ४४५
संस्कृत मूल / भाष्यहिन्दी अनुवाद
तत्कथं दृष्टान्तत्वेन स्वप्नलोकस्य मृत इवोज्जीविष्यन्प्रादुर्भाविष्यति?स्थितिमें वह (जाग्रत्कर्मफल) पुनरुज्जीवित होनेवाले मृतकके समान स्वप्नगत कर्मफलका दृष्टान्त बननेके लिये किस प्रकार प्रादुर्भूत हो सकता है?¹
सत्यम्, विज्ञानमये व्यतिरिक्ते कार्यकारणदेवतात्मत्वप्रदर्शनम् अविद्याध्यारोपितम्—शुक्तिकायामिव रजतत्वदर्शनम्—इत्येतत्सिद्ध्यति व्यतिरिक्तात्मास्तित्वप्रदर्शनन्यायेनैव, न तु तद्विशुद्धिपरतयैव न्याय उक्तः; इत्यसन्नपि दृष्टान्तो जाग्रत्कार्यकरणदेवतात्मत्वदर्शनलक्षणः पुनरुद्भाव्यते । सर्वो हि न्यायः किञ्चिद्विशेषमपेक्षमाणोऽपुनरुक्तीभवति ।पूर्व०—ठीक है, आत्मा प्राणादि व्यतिरिक्त है—यह प्रदर्शन करनेके लिये प्रयोग किये हुए न्यायसे ही विज्ञानमयके अतिरिक्त सिद्ध होनेपर कार्य-करण-देवतात्मप्रदर्शन शुक्तिमें रजतदर्शनके समान अविद्याध्यारोपित है—यह सिद्ध हो जाता है; किंतु वह न्याय आत्माकी विशुद्धि सिद्ध करनेके लिये [अर्थात् आत्मासे भिन्न अन्य सारा प्रपञ्च मिथ्या है—यह सिद्ध करनेके लिये] ही नहीं कहा गया; इसलिये असत् होनेपर भी इस जाग्रत् कार्य-करण-देवतात्मरूप दृष्टान्तकी पुनः उद्भावना की जाती है । सभी न्याय कुछ विशेषताकी अपेक्षा रखनेपर अपुनरुक्त माने जाते हैं ।
न तावत्स्वप्नेऽनुभूतमहाराजत्वादयो लोका आत्मभूताः; आत्म-सिद्धान्ती—किंतु स्वप्नमें अनुभव होनेवाले महाराजत्वादि कर्मफल अपने स्वरूपसे हैं भी तो नहीं,

१. अर्थात् यदि जाग्रत्कालिक कर्मफल स्वयं ही अविद्याध्यारोपित है तो उसके दृष्टान्तद्वारा स्वाप्न प्रपञ्चका सत्यत्व कैसे सिद्ध किया जा सकता है ?

४४६ | बृहदारण्यकोपनिषद् | [ अध्याय २

४४६बृहदारण्यकोपनिषद्[ अध्याय २

| नोऽन्यस्य जाग्रत्प्रतिविम्बभूतस्य लोकस्य दर्शनात् । महाराज एव तावद्व्यस्तसुप्तासु प्रकृतिषु पर्यङ्के शयानःस्वप्नान्पश्यन्नुपसंहतकरणः पुनरुपगतप्रकृतिं महाराजमिवात्मानं जागरित इव पश्यति यात्रागतं भुञ्जानमिव च भोगान् । न च तस्य महाराजस्य पर्यङ्के शयनाद् द्वितीयोऽन्यः प्रकृत्युपेतो विषये पर्यटन्नहनि लोके प्रसिद्धोऽस्ति, यमसौ सुप्तः पश्यति । न चोपसंहृतकरणस्य रूपादिमतो दर्शनमुपपद्यते । न च देहे देहान्तरस्य तत्तुल्यस्य सम्भवोऽस्ति, देहस्थस्यैव हि स्वप्नदर्शनम् । | क्योंकि उस अवस्था में आत्मा से भिन्न जाग्रत्काल का प्रतिबिम्बभूत कर्मफल देखा जाता है । उस समय जिसकी इन्द्रियाँ आत्मामें लीन रहती हैं, वह पलंग पर सोया हुआ महाराज ही, अन्य सब सेवकों के जहाँ-तहाँ सोते रहने पर स्वप्न देखता हुआ अपने को जागरितअवस्था के समान पुनः सेवकादि से युक्त महाराज के समान यात्रा में जाते हुए तथा भोग भोगते हुए देखता है । उस महाराज के पलंग पर शयन करनेवाले देह के अतिरिक्त सेवकादिके सहित देशमें भ्रमण करनेवाला कोई अन्य देह दिन में नहीं देखा जाता, जिसे वह स्वप्नावस्था में देखता हो । तथा जिसकी इन्द्रियाँ लीन हो गयी हैं ऐसे उस सुप्त शरीर को रूपादिमान् पदार्थों का दर्शन होना भी सम्भव नहीं है । देहके भीतर भी उसके समान किसी अन्य देहका होना सम्भव नहीं है और स्वप्नदर्शन देहस्थ जीवको ही होता है । | | ननु पर्यङ्के शयानः पथि प्रवृत्तमात्मानं पश्यति—न बहिः स्वप्नान्पश्यतीत्येतदाह—स महाराजो जानपदाञ्जनपदे भवान्राजोपकर- | मगर पलंगपर सोनेवाला देह ही तो अपने को [ देहसे बाहर ] मार्ग में चलता हुआ देखता है ? ऐसी आशङ्का करके कहते हैं, नहीं; वह शरीर से बाहर स्वप्न नहीं देखता—इसी विषय में श्रुतिका यह कथन है—वह महाराज जानपदों—जनपद ( देश ) में रहनेवाले राजाके |

ब्राह्मण १] शाङ्करभाष्यार्थ ४४७

ब्राह्मण १] शाङ्करभाष्यार्थ ४४७


शाङ्करभाष्यम्भाष्यार्थ
णभृतान्भृत्यानन्यांश्च गृहीत्वोपादाय स्व आत्मीय एव जयादिनोपार्जिते जनपदे यथाकामं यो यः कामोऽस्य यथाकाममिच्छातो यथा परिवर्तेतेत्यर्थः; एवमेवैष विज्ञानमयः, एतदिति क्रियाविशेषणम्, प्राणान्गृहीत्वा जागरितस्थानेभ्य उपसंहृत्य स्वे शरीरे स्व एव देहे न बहिः यथाकामं परिवर्तते; कामकर्मभ्यामुद्भासिताः पूर्वानुभूतवस्तुसदृशीर्वासना अनुभवतीत्यर्थः। तस्मात्स्वप्ने मृषाध्यारोपिता एवात्मभूतत्वेन लोका अविद्यमाना एव सन्तः, तथा जागरितेऽपि, इति प्रत्येत्तव्यम्। तस्माद्विशुद्धोऽक्रियाकारकफलात्मको विज्ञानमय इत्येतत्सिद्धम्। यस्माद् दृश्यन्ते द्रष्टुर्विषयभूताः क्रियाकारकफलात्मकाः कार्यकारणलक्षणा लोकाः, तथा स्वप्नेऽपि, तस्मादन्योऽसौपरिकररूप सेवक तथा अन्य सबको लेकर अपने जयादिद्वारा प्राप्त किये देशमें जिस प्रकार यथाकाम—इसकी जैसी-जैसी इच्छा होती है उसके अनुसार यथेच्छ विचरता है—ऐसा इसका तात्पर्य है; इसी प्रकार यह विज्ञानमय प्राणोंको ग्रहणकर—जागरित विषयोंसे हटाकर स्वशरीरमें—अपने ही देहमें, बाहर नहीं, यथेच्छ विचरता है; अर्थात् काम और कर्मोंसे उद्भासित पूर्वानुभूत वस्तुओंके समान रूपवाली वासनाओंका अनुभव करता है। मूलमें 'एतत्' शब्द क्रियाविशेषण है। अतः आत्मस्वरूपसे अविद्यमान ही होनेके कारण स्वप्नावस्थामें जो कर्मफल होते हैं, वे मिथ्या ही हैं, इसी प्रकार जागरित-अवस्थामें भी वे मिथ्या हैं—ऐसा जानना चाहिये। इसलिये यह सिद्ध होता है कि जो क्रिया, कारक और फलरूप नहीं है, वह विज्ञानमय विशुद्ध ही है। क्योंकि क्रिया, कारक एव फलरूप कार्यकरणात्मक लोक (देहेन्द्रियसंघातरूप कर्मफल) द्रष्टाके विषयभूत ही देखे जाते हैं और वैसे ही वे स्वप्नमें भी होते हैं। अतः इन स्वप्न और

४४८ | बृहदारण्यकोपनिषद् | [ अध्याय २

४४८बृहदारण्यकोपनिषद्[ अध्याय २
दृश्येभ्यः स्वप्नजागरितलोकेभ्यो <br> द्रष्टा विज्ञानमयो विशुद्धः ॥१८॥जागरितके दृश्यभूत कर्मफलोंसे <br> विज्ञानमय द्रष्टा भिन्न और विशुद्ध <br> है ॥ १८ ॥

सुषुप्तिका स्वरूप

दर्शनवृत्तौ स्वप्ने वासनाराशे- <br> दृश्यत्वादतद्धर्मतेति विशुद्धताव- <br> गता आत्मनः । तत्र यथाकामं <br> परिवर्तत इति कामवशात्परिवर्तन- <br> मुक्तम् । द्रष्टुर्दृश्यसम्बन्धश्चास्य <br> स्वाभाविक इत्यशुद्धता शङ्क्यते; <br> अतस्तद्विशुद्धयर्थमाह—स्वप्नदर्शनवृत्तिमें वासनाराशि <br> दृश्यरूप होनेके कारण अनात्मधर्म है, <br> इससे आत्माकी विशुद्धता ज्ञात होती <br> है । उस अवस्था में वह यथेच्छ <br> विचरता है—इस प्रकार उसका <br> इच्छानुसार विचरना बतलाया गया। <br> किंतु द्रष्टाका यह दृश्यसे सम्बन्ध <br> स्वाभाविक है, इसलिये उसकी <br> अशुद्धताकी शङ्का की जाती है; अतः <br> उसकी विशुद्धता सिद्ध करनेके लिये <br> श्रुति कहती है—

अथ यदा सुषुप्तो भवति यदा न कस्यचन वेद हिता नाम नाड्यो द्वासप्ततिः सहस्राणि हृदयात्पुरीततमभिप्रतिष्ठन्ते ताभिः प्रत्यवसृप्य पुरीतति शेते स यथा कुमारो वा महाराजो वा महाब्राह्मणो वातिघ्नीमानन्दस्य गत्वा शयीतैवमेवैष एतच्छेते ॥ १९ ॥

इसके पश्चात् जब वह सुषुप्त होता है, जिस समय कि वह किसीके विषयमें—कुछ भी नहीं जानता, उस समय हिता नामकी जो बहत्तर हजार नाड़ियाँ हृदयसे सम्पूर्ण शरीरमें व्याप्त होकर स्थित हैं, उनके द्वारा बुद्धिके साथ जाकर वह शरीरमें व्याप्त होकर शयन करता है । वह जिस प्रकार कोई बालक अथवा महाराज किंवा महाब्राह्मण आनन्दकी दुःखनाशिनी अवस्था-को प्राप्त होकर शयन करे, उसी प्रकार यह शयन करता है ॥ १९ ॥

ब्राह्मण १ ] शाङ्करभाष्यार्थ ४४९

ब्राह्मण १ ] शाङ्करभाष्यार्थ ४४९


शाङ्करभाष्यभाष्यार्थ
अथ यदा सुषुप्तो भवति--यदा स्वप्नयया चरति, तदाप्ययं विशुद्ध एव। अथ पुनर्यदा हित्वा दर्शनवृत्तिं स्वप्नं यदा यस्मिन्काले सुषुप्तः सुष्ठु सुप्तः सम्प्रसादं स्वाभाव्यं गतो भवति--सलिलमिवान्यसम्बन्धकालुष्यं हित्वा स्वाभाव्येन प्रसीदति। कदा सुषुप्तो भवति ? यदा यस्मिन्काले न कस्यचन न किञ्चनेत्यर्थः, वेद विजानाति; कस्यचन वा शब्दादेः सम्बन्धि वस्त्वन्तरं किञ्चन न वेदेत्यध्याहार्यम्; पूर्वं तु न्याय्यम्, सुप्ते तु विशेषविज्ञानाभावस्य विवक्षितत्वात्।'अथ यदा सुप्तो भवति'—जिस समय स्वप्नवृत्तिसे बर्तता है उस समय भी यह विशुद्ध ही होता है। इसके पश्चात् जब दर्शनवृत्तिरूप स्वप्नको त्याग कर जिस समय सुषुप्त—सम्यक् प्रकारसे सुप्त अर्थात् सम्प्रसाद—स्वाभाविक अवस्थाको प्राप्त हुआ होता है—जलके समान अन्य वस्तुके सम्बन्धसे प्राप्त हुई मलिनताको त्यागकर स्वभावतः प्रसन्न होता है। वह सुषुप्त कब होता है ?—जिस समय वह किसीके विषयमें नहीं अर्थात् कुछ भी नहीं जानता, अथवा कस्यचन—किसी शब्दादिके सम्बन्धवाली किसी अन्य वस्तुको नहीं जानता—ऐसा अध्याहार करना चाहिये। इनमें पहला अर्थ ही उचित है; क्योंकि यहाँ सोये हुए पुरुषके विशेष विज्ञानका अभाव बतलाना ही अभीष्ट है।
एवं तावद्विशेषविज्ञानाभावे सुषुप्तो भवतीत्युक्तम्। केन पुनः क्रमेण सुषुप्तो भवति? इत्युच्यते—इस प्रकार यहाँतक यह बतलाया गया कि विशेष विज्ञानके अभावमें पुरुष सुषुप्त होता है। वह किस क्रमसे सुषुप्त होता है, सो अब बतलाया जाता है—
हिता नाम हिता इत्येवंनाम्न्योहिता नाम—'हिता' इस नामवाली जो नाडियाँ अर्थात् अन्नके

बृ० उ० २६—

४५० | बृहदारण्यकोपनिषद् | [ अध्याय २

४५०बृहदारण्यकोपनिषद्[ अध्याय २

| नाड्यः शिरा देहस्यान्नरसविपरिणामभूताः, ताश्च द्वासप्ततिः सहस्राणि, द्वे सहस्रे अधिके सप्ततिश्च सहस्राणि ता द्वासप्ततिःसहस्राणि, हृदयात्--हृदयं नाम मांसपिण्डः--तस्मान्मांसपिण्डात्पुण्डरीकाकारात् पुरीतातं हृदयपरिवेष्टनमाचक्षते, तदुपलक्षितं शरीरमिह पुरीत्तच्छब्देनाभिप्रेतम्--पुरीतमभिप्रतिष्ठन्त इति शरीरं कृत्स्नं व्याप्नुवन्त्योऽश्वत्थपर्णराजय इव बहिर्मुख्यः प्रवृत्ता इत्यर्थः । | रसकी विपरिणामभूता देहकी शिराएं हैं। वे 'द्वासप्ततिः सहस्राणि'—दो सहस्र अधिक सत्तर सहस्र अर्थात् बहत्तर सहस्र हैं, वे हृदयसे—हृदय नामका जो कमलके-से आकारवाला मांसपिण्ड है, उससे 'पुरीततम्'—पुरीतत् हृदयपरिवेष्टनको कहते हैं, यहाँ उससे उपलक्षित शरीर पुरीतत् शब्दसे अभिप्रेत है । अतः 'पुरीततमभिप्रतिष्ठन्ते' अर्थात् सम्पूर्ण शरीरको व्याप्त करती हुई बहिर्मुख होकर प्रवृत्त हैं, जैसे पीपलके पत्तेकी नसें बाहरकी ओर फैली रहती हैं । | | तत्र बुद्धेरन्तःकरणस्य हृदयं स्थानम्, तत्रस्थबुद्धितन्त्राणि चेतराणि बाह्यानि करणानि । तेन बुद्धिः कर्मवशाच्छ्रोत्रादीनि ताभिर्नाडीभिर्मत्स्यजालवत्कर्णशष्कुल्यादिस्थानेभ्यः प्रसारयति, प्रसार्य चाधितिष्ठति जागरितकाले । तां विज्ञानमयोऽभिव्यक्तस्वात्मचैतन्यावभासतया व्याप्नोति । सङ्कोचनकाले च तस्या अनुसङ्कुचति; सोऽस्य विज्ञानमयस्य स्वापः; जाग्रद्विकासानुभवो भोगः; | शरीरमें बुद्धि—अन्तःकरणका हृदय स्थान है, उसमें स्थित बुद्धिके अधीन अन्य बाह्य इन्द्रियाँ हैं । इसीसे बुद्धि कर्मवश श्रोत्रादि इन्द्रियोंको मत्स्यजालके समान उन नाडियोंद्वारा कर्णरन्ध्रादि स्थानोंसे बाहर फैलाती है, तथा उन्हें फैलाकर जागरित-अवस्था में उनकी अध्यक्ष होकर स्थित रहती है । उस बुद्धिको विज्ञानमय आत्मा अभिव्यक्तस्वात्मचैतन्यप्रकाशरूपसे व्याप्त कर लेता है, तथा संकुचित होनेके समय उसीके साथ संकुचित हो जाता है; वही इस विज्ञानमयका सोना है और जाग्रत्कालिक विकासका अनुभव |

ब्राह्मण १ ] शाङ्करभाष्यार्थ ४५१

ब्राह्मण १ ] शाङ्करभाष्यार्थ ४५१


| बुद्ध्युपाधिस्वभावानुविधायी हि सः, चन्द्रादिप्रतिबिम्ब इव जलाद्यनुविधायी। तस्मात्तस्या बुद्धेर्जाग्रद्विषयायास्ताभिर्नाडीभिः प्रत्यवसर्पणमनु प्रत्यवसृप्य पुरीतति शरीरे शेते तिष्ठति, तप्तमिव लोहपिण्डमविशेषेण संव्याप्याग्निवच्छरीरं संव्याप्य वर्तत इत्यर्थः। | इसका भोग है; जिस प्रकार चन्द्रादिका प्रतिबिम्ब [अपने आधारभूत] जलादिका अनुवर्तन करनेवाला होता है, उसी प्रकार वह बुद्धिरूप अपनी उपाधिके स्वभावका ही अनुवर्ती है। अतः उस जाग्रद्विषयिणी बुद्धिके व्यावर्तन (लौटने) के साथ-साथ वह उन नाड़ियोंद्वारा व्यावृत होकर पुरीतत्में—शरीरमें शयन करता—स्थित होता है, तात्पर्य यह है कि तपे हुए लोहपिण्डमें अग्निके समान वह सामान्यरूपसे शरीरमें व्याप्त होकर स्थित होता है।^१ | | स्वाभाविक एव स्वात्मनि वर्तमानोऽपि कर्मानुगतबुद्ध्यनुवृत्तित्वात्पुरीतति शेत इत्युच्यते। न हि सुषुप्तिकाले शरीरसम्बन्धोऽस्ति। "तीर्णो हि तदा सर्वान्शोकान्हृदयस्य" (४। ३। २२) इति हि वक्ष्यति। | वह अपने स्वाभाविक स्वरूपमें ही विद्यमान रहते हुए भी कर्मानुसारिणी बुद्धिका अनुवर्ती होनेके कारण 'शरीरमें शयन करता है' इस प्रकार कहा जाता है। सुषुप्तिकालमें उसका शरीरसे सम्बन्ध नहीं रहता। "उस समय वह हृदयके सारे शोकोंको पार कर लेता है" ऐसा श्रुति कहेगी भी। | | सर्वसंसारदुःखवियुक्ता इयमवस्थेत्यत्र दृष्टान्तः—स यथा | यह अवस्था संसारके सारे दुःखोंसे रहित है—इस विषयमें यह दृष्टान्त दिया जाता है—वह जिस |


१. अर्थात् उसकी किसी स्थानविशेषमें विशेष अभिव्यक्ति नहीं रहती, बुद्धिके संकोचके साथ उसका भी संकोच हो जाता है; केवल सामान्य सत्तामात्रसे अपने शुद्धस्वरूपमें स्थित रहता है।

४५२ बृहदारण्यकोपनिषद् [अध्याय २

४५२ बृहदारण्यकोपनिषद् [अध्याय २

संस्कृतहिन्दी
कुमारो वा अत्यन्तबालो वा, महाराजो वात्यन्तवश्यप्रकृतिर्यथोक्तकृत्, महाब्राह्मणो वा अत्यन्तपरिपक्वविद्याविनयसम्पन्नः, अतिघ्नीम्—अतिशयेन दुःखं हन्तीत्यतिघ्नी आनन्दस्यावस्था सुखावस्था तां प्राप्य गत्वा शयीतावतिष्ठेत।प्रकार कुमार—अत्यन्त छोटा बालक, अथवा जिसकी प्रजा अत्यन्त वशमें की हुई है, ऐसा कोई शास्त्रोक्त आचरण करनेवाला महाराज, अथवा अत्यन्त परिपक्व विद्या-विनय-सम्पन्न महाब्राह्मण 'अतिघ्नीम्'—जो अतिशयरूपसे दुःखका घात कर देती है ऐसी जो अतिघ्नी आनन्दकी अवस्था यानी सुखावस्था है, उसको प्राप्त होकर शयन करे अर्थात् स्थित हो।
एषां च कुमारादीनां स्वभावस्थानां सुखं निरतिशयं प्रसिद्धं लोके, विक्रियमाणानां हि तेषां दुःखं न स्वभावतः; तेन तेषां स्वाभाविक्यवस्था दृष्टान्तत्वेनोपादीयते प्रसिद्धत्वात्। न तेषां स्वाप एवाभिप्रेतः, स्वापस्य दार्ष्टान्तिकत्वेन विवक्षितत्वाद्विशेषाभावाच्च। विशेषे हि सति दृष्टान्तदार्ष्टान्तिकभेदः स्यात्; तस्मान्न तेषां स्वापो दृष्टान्तः।अपने स्वभावमें स्थित इन कुमारादिका सुख लोकमें सबसे बढ़कर प्रसिद्ध है, उन्हें विकृत होनेपर ही दुःख होता है, स्वभावतः नहीं; अतः प्रसिद्ध होनेके कारण उनकी स्वाभाविक अवस्थाको दृष्टान्तरूपसे ग्रहण किया जाता है। यहाँ केवल उनकी सुषुप्तावस्थासे ही अभिप्राय नहीं है; क्योंकि सुषुप्तावस्था तो दार्ष्टान्तिकरूपसे ही ग्रहण की गयी है, इसलिये फिर तो दृष्टान्त और दार्ष्टान्तिकमें कोई विशेषता ही नहीं रहेगी। और दृष्टान्त-दार्ष्टान्तिकका भेद किसी विशेषताके रहनेपर ही हो सकता है; इसलिये यहाँ उनकी सुषुप्ति दृष्टान्त नहीं है।

ब्राह्मण १ ] शाङ्करभाष्यार्थ ४५३


एवमेव यथायं दृष्टान्तः, एष विज्ञानमय एतच्छयनं शेते इति, एतच्छब्दः क्रियाविशेषणार्थः । एवमयं स्वाभाविके स्वे आत्मनि सर्वसंसारधर्मातीतो वर्तते स्वापकाल इति ॥१९॥इसी प्रकार, जैसा कि यह दृष्टान्त है, यह विज्ञानमय 'एतत् शेते'—इस शयनमें सोता है। यहाँ 'एतत्' शब्द क्रियाविशेषणार्थक है। अर्थात् इस प्रकार सुषुप्तावस्थामें यह अपने स्वाभाविक स्वरूपमें सारे सांसारिक धर्मोंसे अतीत होकर विद्यमान रहता है ॥ १६॥
[कुत एतदागादिति प्रश्नो मीमांस्यते]<br>क्वैष तदाभूदित्यस्य प्रश्नस्य प्रतिवचनमुक्तम् । अनेन च प्रश्ननिर्णयेन विज्ञानमयस्य स्वभावतो विशुद्धिरसंसारित्वं चोक्तम्। कुत एतदागात् ? इत्यस्य प्रश्नस्यापाकरणार्थ आरम्भः ।'उस समय यह कहाँ था ?' इस प्रश्नका उत्तर कह दिया गया । इस प्रश्नके निर्णयसे ही विज्ञानमय आत्माकी स्वभावतः विशुद्धि और असंसारिता भी बतला दी गयी । अब 'यह कहाँसे आया ?' इस प्रश्नके निराकरणके लिये आरम्भ किया जाता है ।
ननु यस्मिन्ग्रामे नगरे वा यो भवति सोऽन्यत्र गच्छंस्तत एव ग्रामान्नगराद्वा गच्छति नान्यतः तथा सति क्वैष तदाभूदित्येतावानेवास्तु प्रश्नः । यत्राभूत्तत एवागमनं प्रसिद्धं स्यान्नान्यत इति कुत एतदागादिति प्रश्नो निरर्थक एव ।पूर्व०—जो पुरुष जिस ग्राम या नगरमें रहता है, वह अन्यत्र जाते समय उसी ग्राम या नगरसे जाता है, किसी अन्य स्थानसे नहीं । ऐसी स्थितिमें 'उस समय यह कहाँ था ?' बस, इतना ही प्रश्न हो सकता है । जहाँ वह था, वहींसे उसका आगमन प्रसिद्ध होगा, अन्य स्थानसे नहीं । इसलिये 'यह कहाँसे आया ?' यह प्रश्न निरर्थक ही है ।
किं श्रुतिरुपालभ्यते भवता ?सिद्धान्ती—क्या आप श्रुतिको उलाहना देते हैं ?
न ।पूर्व०—नहीं ।

| ४५४ | बृहदारण्यकोपनिषद् | [अध्याय २ |

४५४बृहदारण्यकोपनिषद्[अध्याय २

| किं तर्हि ?<br>द्वितीयस्य प्रश्नस्यार्थान्तरं श्रोतुमिच्छाम्यत आनर्थक्यं चादयामि। | **सिद्धान्ती—**तो फिर क्या बात है?<br>**पूर्व०—**मैं दूसरे प्रश्नका कोई और अर्थ सुनना चाहता हूँ, इसी लिये इसकी व्यर्थताकी शङ्का करता हूँ। | | एवं तर्हि कुत इत्यपादानार्थता न गृह्यते; अपादानार्थत्वे हि पुनरुक्तता, नान्यार्थत्वे। अस्तु तर्हि निमित्तार्थः प्रश्नः—कुत एतदागात् किंनिमित्तमिहागमनम् ? इति। | **एकदेशी—**अच्छा, तो फिर ‘कुतः’ इस शब्दकी [‘कहाँसे’—इस प्रकार] अपादानार्थता ग्रहण नहीं की जाती; क्योंकि अपादानार्थता ग्रहण करनेपर ही पुनरुक्तिका दोष होता है, कोई अन्य अर्थ लेनेपर नहीं। अच्छा तो, इस प्रश्नको निमित्तार्थक माना जाय। अर्थात् ‘कुत एतत् आगात्’—किस निमित्तसे इसका यहाँ आना हुआ ? | | न निमित्तार्थतापि, प्रतिवचनवैरूप्यात्। आत्मनश्च सर्वस्य जगतोऽग्निविस्फुलिङ्गादिवदुत्पत्तिः प्रतिवचने श्रूयते। न हि विस्फुलिङ्गानां विद्रवणेऽग्निर्निमित्तमपादानमेव तु सः। तथा परमात्मा विज्ञानमयस्यात्मनोऽपादानत्वेन श्रूयते ‘अस्मादात्मनः’ इत्येतस्मिन्वाक्ये। तस्मात्प्रतिवचनवैलोम्यात्कुत इति प्रश्नस्य निमित्तार्थता न शक्यते वर्णयितुम्। | **सिद्धान्ती—**इसकी निमित्तार्थता भी नहीं हो सकती, क्योंकि ऐसा माननेसे इसका उत्तरसे विरोध होगा। उत्तरमें अग्निसे विस्फुलिङ्गादिके समान आत्मासे ही जगत्की उत्पत्ति सुनी जाती है। विस्फुलिङ्गों (चिनगारियों) के फैलनेमें अग्नि निमित्त नहीं है, वह तो अपादान ही है। इसी प्रकार ‘इस आत्मासे’ इस वाक्यमें परमात्मा विज्ञानमय आत्माके अपादानरूपसे सुना जाता है। अतः उत्तरसे विरोध आनेके कारण ‘कुतः’ इस प्रश्नकी निमित्तार्थता वर्णन नहीं की जा सकती। |

ब्राह्मण १ ] | शाङ्करभाष्यार्थ | ४५५

ब्राह्मण १ ]शाङ्करभाष्यार्थ४५५
संस्कृतहिन्दी
नन्वपादानपक्षेऽपि पुनरुक्तता-**पूर्व०—**किंतु अपादान-पक्षको
दोषः स्थित एव ।स्वीकार करनेपर भी पुनरुक्तताका दोष तो खड़ा ही रहता है ।
नैष दोषः, प्रश्नाभ्याम् आत्मनि**सिद्धान्ती—**यह कोई दोष नहीं
क्रियाकारकफलात्मतापोहस्य विव-है; क्योंकि इन प्रश्नोंसे आत्मामें
क्षितत्वात् । इह हि विद्याविद्या-क्रिया-कारक-फलात्मकताकी निवृत्ति
विषयावुपन्यस्तौ । "आत्मेत्येवो-प्रतिपादन करनी अभीष्ट है । यहाँ
पासीत" (१ । ४ । ७) "आ-विद्या और अविद्या दोनोंहीके
त्मानमेवावेत्" (१ । ४ । १०)विषयोंका वर्णन किया गया है
"आत्मानमेव लोकमुपासीत""आत्मा है—इस प्रकार उपासना
(१ । ४ । १५) इति विद्या-करे" "आत्माहीको जाना" "आत्म-
विषयः । तथा अविद्याविषयश्चलोककी ही उपासना करे" यह
पाङ्क्तं कर्म तत्फलं चान्नत्रयंविद्याका विषय है। तथा पाङ्क्तकर्म
नामरूपकर्मात्मकमिति । तत्रा-और उसका फल नामरूप-कर्मात्मक
विद्याविषये वक्तव्यं सर्वमुक्तम् ।अन्नत्रय—यह अविद्याका विषय
विद्याविषयस्त्वात्मा केवल उपन्य-है। इनमें अविद्याके विषयमें तो
स्तो न निर्णीतः । तन्निर्णयायदिया, विद्याके विषय आत्माका
'ब्रह्म ते ब्रवाणि' (२ । १ । १)तो केवल उल्लेख किया है, उसका
इति प्रक्रान्तं 'ज्ञापयिष्यामि'निर्णय नहीं किया । उसका निर्णय
(२ । १ । १५) इति च । अत-करनेके लिये ही 'मैं तुम्हें ब्रह्मका
स्तद्ब्रह्म विद्याविषयभूतं ज्ञापयि-उपदेश करूँगा' इस प्रकार तथा
तव्यं याथात्म्यतः । तस्य च'ज्ञान कराऊँगा' इस प्रकार प्रक-
याथात्म्यं क्रियाकारकफलभेद-रण उठाया है । अतः विद्याके
शून्यमत्यन्तविशुद्धमद्वैतमित्येत-विषयभूत उस ब्रह्मका यथार्थ
रीतिसे ज्ञान कराना है । उसका
यथार्थ स्वरूप क्रिया-कारक-फलरूप
भेदसे रहित, अत्यन्त विशुद्ध और
अद्वैत है—यह बतलाना अभीष्ट है ।

४५६ | बृहदारण्यकोपनिषद् | [अध्याय २

४५६बृहदारण्यकोपनिषद्[अध्याय २

| द्विवक्षितम् । अतस्तदनुरूपौ प्रश्नावुत्थाप्येते श्रुत्या 'क्वैष तदाभूत्' 'कुत एतदागात्' इति ।<br><br>तत्र यत्र भवति तदधिकरणं यद्भवति तदधिकर्त्तव्यम्, तयोश्चाधिकरणाधिकर्त्तव्ययोर्भेदो दृष्टो लोके । तथा यत आगच्छति तदपादानं य आगच्छति स कर्ता तस्मादन्यो दृष्टः । तथा आत्मा क्वाप्यभूदन्यस्मिन्नन्यः कुतश्चिदागादन्यस्मादन्यः केनचिद्भिन्नेन साधनान्तरेणेत्येवं लोकवत्प्राप्ता बुद्धिः । सा प्रतिवचनेन निवर्तयितव्येति । नायमात्मा अन्योऽन्यत्राभूदन्यो वा अन्यस्मादागतः साधनान्तरं वा आत्मन्यस्ति । किं तर्हि ? स्वात्मन्येवाभूत् "स्वम् (आत्मानम्) अपीतो भवति" (छा० उ० ६।८। १) "सता सोम्य तदा सम्पन्नो भवति" (छा० उ० ६ | इसलिये उसके अनुरूप ही श्रुति 'उस समय यह कहाँ था ?' और 'यह कहाँसे आया ?'—इन दो प्रश्नोंको उठाती है ।<br><br>उनमें, जहाँ रहता है वह अधिकरण होता है और जो रहता है वह अधिकर्त्तव्य होता है । लोकमें उन अधिकरण और अधिकर्त्तव्योंका भेद देखा गया है । इसी प्रकार जहाँसे आता है वह अपादान होता है और जो आता है वह कर्ता उससे भिन्न देखा जाता है । इस प्रकार आत्मा किसी अन्यमें उससे भिन्नरूपमें था और किसी अन्यस्थानसे उससे भिन्न रूपसे ही किसी भिन्न साधनान्तरके द्वारा आया है—इस प्रकार लोकवत् ऐसी बुद्धि प्राप्त होती है । इसका उत्तर देकर निराकरण करना है । [ अर्थात् यह बतलाना है कि ] यह आत्मा न तो अन्यरूपसे किसी अन्यस्थानमें अथवा न यह अन्यरूपसे अन्यके पाससे आया है और न आत्मामें कोई अन्य साधन ही है । तो फिर क्या बात है ?—यह अपने स्वरूपमें ही था; जैसा कि "स्वात्माको प्राप्त हो जाता है", "हे सोम्य ! उस समय यह सत्‌से सम्पन्न (संयुक्त) हो जाता |

ब्राह्मण १ ] शाङ्करभाष्यार्थ [ ४५७

ब्राह्मण १ ] शाङ्करभाष्यार्थ [ ४५७

(८।१) "प्राज्ञेनात्मना सम्परिष्वक्तः' (बृ० उ० ४।३।२१) "परे आत्मनि सम्प्रतिष्ठते" (प्र० उ० ४।७) इत्यादि-श्रुतिभ्यः। अत एव नान्योऽन्यस्मादागच्छति। तच्छ्रुत्यैव प्रदर्श्यते 'अस्मादात्मनः' इति। आत्मव्यतिरेकेण वस्त्वन्तराभावात्।है", "प्राज्ञात्मासे सम्यक् प्रकारसे आलिङ्गित रहता है", "परमात्मामें सम्यक् प्रकारसे स्थित हो जाता है" इत्यादि श्रुतियोंसे सिद्ध होता है। अतः अन्य आत्मा किसी अन्यके पाससे नहीं आता। यह बात 'इस आत्मासे' इत्यादि रूपसे श्रुति ही प्रदर्शित करती है; क्योंकि आत्मासे भिन्न वस्तुकी तो सत्ता ही नहीं है।
नन्वस्ति प्राणाद्यात्मव्यतिरिक्तं वस्त्वन्तरम्।पूर्व०—आत्मासे भिन्न प्राणादि वस्तुएँ हैं तो?
न, प्राणादेस्तत एव निष्पत्तेः।सिद्धान्ती—नहीं, क्योंकि प्राणादिकी निष्पत्ति तो उसीसे होती है।
तत्कथम् ?पूर्व०—सो किस प्रकार?
इत्युच्यते, तत्र दृष्टान्तः—सिद्धान्ती—बतलाते हैं, उसमें यह दृष्टान्त है—

आत्मासे जगत्की उत्पत्तिमें ऊर्णनाभि और अग्नि-विस्फुलिङ्गका दृष्टान्त

स यथोर्णनाभिस्तन्तुनोच्चरेद्यथाग्नेः क्षुद्रा विस्फुलिङ्गा व्युच्चरन्त्येवमेवास्मादात्मनः सर्वे प्राणाः सर्वे लोकाः सर्वे देवाः सर्वाणि भूतानि व्युच्चरन्ति तस्योपनिषत्सत्यस्य सत्यमिति प्राणा वै सत्यं तेषामेष सत्यम् ॥ २० ॥

जिस प्रकार वह ऊर्णनाभि (मकड़ा) तन्तुओंपर ऊपरकी ओर जाता है तथा जैसे अग्निसे अनेकों क्षुद्र चिनगारियाँ उड़ती हैं, उसी प्रकार इस आत्मासे समस्त प्राण, समस्त लोक, समस्त देवगण और समस्त भूत विविध रूपसे उत्पन्न होते हैं। 'सत्यका सत्य' यह उस आत्माकी उपनिषद् है। प्राण ही सत्य है। उन्हींका यह सत्य है ॥ २० ॥