बृहदारण्यकोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)
Brihadaranyaka Upanishad with Shankara Bhashya
आदि शङ्कराचार्य द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)
पृष्ठ 445, कुल 1402 में से
संदर्भ में पढ़ेंब्राह्मण १] शाङ्करभाष्यार्थ ४३९
| पृच्छति गार्ग्यं प्रतिभानरहितं बुद्धिव्युत्पादनाय । <br><br> क्वौष तदाभूत् ? कुत एतदागात् इत्येतदुभयं गार्ग्येणैव प्रष्टव्यमासीत्, तथापि गार्ग्येण न पृष्टमिति नोदास्ते अजातशत्रुः, बोधयितव्य एवेति प्रवर्तते । ज्ञापयिष्याम्येवेति प्रतिज्ञातत्वात् । <br><br> एवमसौ व्युत्पाद्यमानोऽपि गार्ग्यो यत्रैष आत्माभूत्प्राक्प्रतिबोधाद् यतश्चैतदागमनमागात् तदुभयं न व्युत्पेदे वक्तुं वा प्रष्टुं वा गार्ग्यो ह न मेने न ज्ञातवान् ॥ १६ ॥ | की कमी जान पड़ती है, उस गार्ग्यसे उसकी बुद्धिको व्युत्पन्न (सूक्ष्म विचार-शक्तिसे युक्त) करनेके लिये राजा अजातशत्रु पूछता है । <br><br> 'उस समय यह कहाँ था ? और यह कहाँसे आया है' ये दोनों प्रश्न गार्ग्यको ही पूछने चाहिये थे; किंतु गार्ग्यने इन्हें नहीं पूछा, इससे अजातशत्रुने उदासीन भाव धारण नहीं किया; अपितु यह निश्चय करके कि इसे बोध कराना ही है, वह स्वयं प्रवृत्त हो गया; क्योंकि उसने 'बोध कराऊँगा ही', ऐसी प्रतिज्ञा की थी । <br><br> इस प्रकार सचेत करनेपर भी 'जहाँ यह आत्मा जागनेसे पहले था और जहाँसे इसने आगमन किया है' इन दोनों बातोंको गार्ग्य न समझ सका अर्थात् इन्हें बतलाने या पूछनेका उसे ज्ञान नहीं हुआ ॥ १६ ॥ |
विज्ञानात्माके शयनस्थानका प्रतिपादन तथा स्वपितिशब्दका निर्वचन
स होवाचाजातशत्रुर्यत्रैष एतत्सुप्तोऽभूद्य एष विज्ञानमयः पुरुषस्तदेषां प्राणानां विज्ञानेन विज्ञानमादाय य एषोऽन्तर्हृदय आकाशस्तस्मिञ्छेते तानि यदा गृह्णात्यथ हैतत्पुरुषः स्वपिति नाम तद्गृहीत एव प्राणो भवति गृहीता वाग्गृहीतं चक्षुर्गृहीतं श्रोत्रं गृहीतं मनः ॥ १७ ॥