बृहदारण्यकोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)
Brihadaranyaka Upanishad with Shankara Bhashya
आदि शङ्कराचार्य द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)
पृष्ठ 444, कुल 1402 में से
संदर्भ में पढ़ें| ४३८ | बृहदारण्यकोपनिषद् | [ अध्याय २ |
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| च प्रसिद्धवदनुवादाद् अवयवोपमार्थयोश्चात्रासम्भवात् पारिशेष्यात्प्रायार्थतैव। तस्मात्संकल्पविकल्पाद्यात्मकमन्तःकरणं तन्मय इत्येतत्। पुरुषः पुरि शयनात्। | श्रुतियोंमें 'यह' इस प्रकार विज्ञानमयका प्रसिद्धवत् अनुवाद करनेसे तथा [ जीव विज्ञानका अवयव या विज्ञानसदृश है—इस प्रकार ] अवयव और उपमारूप अर्थ सम्भव न होनेसे परिशेषतः इसकी प्रायार्थता ही सिद्ध होती है। अतः संकल्प-विकल्पादिरूप अन्तःकरण विज्ञान है, तन्मय आत्मा है—ऐसा इसका भावार्थ है। पुरमें ( शरीररूप नगरमें ) शयन करनेके कारण वह 'पुरुष' है। | | कैष तदाभूदिति प्रश्नः स्वभावविजिज्ञापयिषया—प्राक्प्रतिबोधात्क्रियाकारकफलविपरीतस्वभाव आत्मेति कार्याभावेन दिदर्शयिषितम्; न हि प्राक्प्रतिबोधात्कर्मादिकार्यं सुखादि किञ्चन गृह्यते; तस्मादकर्मप्रयुक्तत्वात्तथास्वाभाव्यमेवात्मनोऽवगम्यते—यस्मिन्स्वाभाव्येऽभूत्, यतश्च स्वाभाव्यात्प्रच्युतः संसारी स्वभावविलक्षण इति—एतद्विवक्षया | उस समय यह कहाँ था ?—यह प्रश्न आत्माके स्वभाव (स्वरूप) का विशेषरूपसे बोध करानेकी इच्छासे है—जागनेसे पहले आत्मा क्रिया-कारक-फलरूपतासे विपरीत स्वभाववाला है—यह उसके कार्याभावसे दिखाना अभीष्ट है; क्योंकि जागनेसे पहले कर्मादिका कार्य सुख आदि कुछ भी ग्रहण नहीं किया जाता। अतः अकर्मप्रयुक्त होनेके कारण आत्माकी अकर्मस्वभावता ज्ञात होती है—जिस स्वभाववालेमें यह था और जिस स्वभाववालेसे च्युत होकर यह संसारी और भिन्नस्वभाव होता है—यह बतानेकी इच्छासे, जिसमें प्रतिभा- |