भारतकोश
बृहदारण्यकोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)

बृहदारण्यकोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)

Brihadaranyaka Upanishad with Shankara Bhashya

आदि शङ्कराचार्य द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished1,402 पृष्ठ

पृष्ठ 443, कुल 1402 में से

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पृष्ठ 443

| ब्राह्मण १ ] | शाङ्करभाष्यार्थ | ४३७ | | :--- | :--- |


| पुरुष एतत्स्वपनं सुप्तोऽभूत्प्रा-<br>क्पाणिपेषप्रतिबोधात्; विज्ञानं<br>विज्ञायतेऽनेनेत्यन्तःकरणं बुद्धि-<br>रुच्यते, तन्मयस्तत्प्रायो विज्ञान-<br>मयः किं पुनस्तत्प्रायत्वम् ? तस्मि-<br>न्नुपलभ्यत्वं तेन चोपलभ्यत्वमु-<br>पलब्धृत्वं च; कथं पुनर्मयटोऽने-<br>कार्थत्वे प्रायार्थतैवावगम्यते "स<br>वा अयमात्मा ब्रह्म विज्ञानमयो<br>मनोमयः” ( बृ० उ० ४ । ४ ।<br>५ ) इत्येवमादौ प्रायार्थ एव प्रयो-<br>गदर्शनात्, परविज्ञानविकारत्व-<br>स्याप्रसिद्धत्वात्, “य एष विज्ञान-<br>मयः” ( २ । १ । १६ ) इति | दबानेपर जागनेसे पूर्व सोया हुआ<br>था [ उस समय वह कहाँ था ? ]¹<br>जिससे विशेषरूपसे जाना जाता है<br>उस अन्तःकरण यानी बुद्धिको<br>'विज्ञान' कहते हैं; जो तन्मय अर्थात्<br>तत्प्राय हो वह विज्ञानमय है। किंतु<br>आत्माकी तत्प्रायता (विज्ञानमयता)<br>क्या है ?² जो उस ( विज्ञान ) में<br>प्राप्त होने योग्य है, अथवा जिसे उस<br>( विज्ञान ) के ही द्वारा प्राप्त किया<br>जा सकता है तथा जो उपलब्धा<br>( साक्षी ) है, उसको 'तत्प्राय'<br>( विज्ञानप्राय ) कहते हैं, उसका<br>भाव तत्प्रायत्व है। किंतु 'मयट्'<br>प्रत्ययके अनेक अर्थ होनेपर भी यहाँ<br>उसकी प्रायार्थता ही कैसे जानी<br>जाती है ? "वह यह आत्मा—ब्रह्म<br>विज्ञानमय और मनोमय है" इत्यादि<br>श्रुतियोंमें इसका प्रायः अर्थमें ही<br>प्रयोग देखा जानेसे, परमात्मरूप<br>विज्ञानका विकारत्व प्रसिद्ध न होनेसे<br>“जो यह विज्ञानमय है” इत्यादि |


१. यहाँ विज्ञानमय शब्दमें जो मयट् प्रत्यय है, उसको विकारार्थक मानकर विज्ञानमय शब्दका अर्थ कोई यह न समझ ले कि 'विज्ञान—परमात्माके विकारभूत जीव ही विज्ञानमय हैं।' इसके लिये भाष्यकार विज्ञानमयकी व्युत्पत्ति करते हैं।
२. यहाँ यह शङ्का होती है आत्मा तो असङ्ग है, उसका बुद्धिसे सम्पर्क नहीं हो सकता; अतः आत्माको विज्ञानमय—अन्तःकरणमय बताना उचित नहीं है, इस शङ्काको मिटानेके लिये तत्प्रायत्वका निरूपण करते हैं।

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