बृहदारण्यकोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)
Brihadaranyaka Upanishad with Shankara Bhashya
आदि शङ्कराचार्य द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)
पृष्ठ 442, कुल 1402 में से
संदर्भ में पढ़ें| ४३६ | बृहदारण्यकोपनिषद् | [ अध्याय २ |
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| वास्ति। तस्मादनवसरः समत्वाद् गुणभावानुपगम इति चोद्यस्य। | अतः 'तुल्य होनेके कारण इसका गुणभाव (पदार्थत्व या अप्रधानत्व) नहीं माना जा सकता'—ऐसी शङ्काके लिये यहाँ अवकाश नहीं है। | | विशेषवतो हि सोपाधिकस्य संव्यवहारार्थो गुणगुणिभावः, न विपरीतस्य। निरूपाख्यो हि विजिज्ञापयिषितः सर्वस्यामुपनिषदि। "स एष नेति नेति" (३।९।२६) इत्युपसंहारात्। तस्मादादित्यादिब्रह्मभ्य एतेभ्योऽविज्ञानमयेभ्यो विलक्षणोऽन्योऽस्ति विज्ञानमय इत्येतत्सिद्धम् ॥ १५ ॥ | विशेषतः सोपाधिकका ही सम्यक् व्यवहारके लिये गुणगुणिभाव (शेष-शेषिभाव) होता है, इससे विपरीत (निरुपाधिक) का नहीं। और समस्त उपनिषद्में निरुपाधिकका ही विज्ञान कराना अभीष्ट है, क्योंकि "वह यह कार्य नहीं है, कारण नहीं है" इस प्रकार उपसंहार किया गया है। अतः यह सिद्ध होता है कि इन अविज्ञानमय आदित्यादि ब्रह्मोंसे विज्ञानमय ब्रह्म भिन्न है ॥ १५ ॥ |
सुषुप्तिमें विज्ञानमयकी स्थितिके विषयमें अजातशत्रुका प्रश्न
स होवाचाजातशत्रुर्यत्रैष एतत्सुप्तोऽभूद्य एष विज्ञानमयः पुरुषः क्वैष तदाभूत्कुत एतदागादिति तदु ह न मेने गार्ग्यः ॥ १६ ॥
उस अजातशत्रुने कहा, 'यह जो विज्ञानमय पुरुष है, जब सोया हुआ था, तब कहाँ था? और यह कहाँसे आया?' किंतु गार्ग्य यह न जान सका ॥ १६ ॥
| स एवमजातशत्रुर्व्यतिरिक्तात्मास्तित्वं प्रतिपाद्य गार्ग्यमुवाच— | उस अजातशत्रुने इस प्रकार देहसे व्यतिरिक्त आत्माका अस्तित्व प्रतिपादन करके गार्ग्यसे कहा—'जिस | | यत्र यस्मिन्काले एष विज्ञानमयः | समय यह विज्ञानमय पुरुष हाथसे |