भारतकोश
बृहदारण्यकोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)

बृहदारण्यकोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)

Brihadaranyaka Upanishad with Shankara Bhashya

आदि शङ्कराचार्य द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished1,402 पृष्ठ

पृष्ठ 460, कुल 1402 में से

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पृष्ठ 460
४५४बृहदारण्यकोपनिषद्[अध्याय २

| किं तर्हि ?<br>द्वितीयस्य प्रश्नस्यार्थान्तरं श्रोतुमिच्छाम्यत आनर्थक्यं चादयामि। | **सिद्धान्ती—**तो फिर क्या बात है?<br>**पूर्व०—**मैं दूसरे प्रश्नका कोई और अर्थ सुनना चाहता हूँ, इसी लिये इसकी व्यर्थताकी शङ्का करता हूँ। | | एवं तर्हि कुत इत्यपादानार्थता न गृह्यते; अपादानार्थत्वे हि पुनरुक्तता, नान्यार्थत्वे। अस्तु तर्हि निमित्तार्थः प्रश्नः—कुत एतदागात् किंनिमित्तमिहागमनम् ? इति। | **एकदेशी—**अच्छा, तो फिर ‘कुतः’ इस शब्दकी [‘कहाँसे’—इस प्रकार] अपादानार्थता ग्रहण नहीं की जाती; क्योंकि अपादानार्थता ग्रहण करनेपर ही पुनरुक्तिका दोष होता है, कोई अन्य अर्थ लेनेपर नहीं। अच्छा तो, इस प्रश्नको निमित्तार्थक माना जाय। अर्थात् ‘कुत एतत् आगात्’—किस निमित्तसे इसका यहाँ आना हुआ ? | | न निमित्तार्थतापि, प्रतिवचनवैरूप्यात्। आत्मनश्च सर्वस्य जगतोऽग्निविस्फुलिङ्गादिवदुत्पत्तिः प्रतिवचने श्रूयते। न हि विस्फुलिङ्गानां विद्रवणेऽग्निर्निमित्तमपादानमेव तु सः। तथा परमात्मा विज्ञानमयस्यात्मनोऽपादानत्वेन श्रूयते ‘अस्मादात्मनः’ इत्येतस्मिन्वाक्ये। तस्मात्प्रतिवचनवैलोम्यात्कुत इति प्रश्नस्य निमित्तार्थता न शक्यते वर्णयितुम्। | **सिद्धान्ती—**इसकी निमित्तार्थता भी नहीं हो सकती, क्योंकि ऐसा माननेसे इसका उत्तरसे विरोध होगा। उत्तरमें अग्निसे विस्फुलिङ्गादिके समान आत्मासे ही जगत्की उत्पत्ति सुनी जाती है। विस्फुलिङ्गों (चिनगारियों) के फैलनेमें अग्नि निमित्त नहीं है, वह तो अपादान ही है। इसी प्रकार ‘इस आत्मासे’ इस वाक्यमें परमात्मा विज्ञानमय आत्माके अपादानरूपसे सुना जाता है। अतः उत्तरसे विरोध आनेके कारण ‘कुतः’ इस प्रश्नकी निमित्तार्थता वर्णन नहीं की जा सकती। |