बृहदारण्यकोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)

बृहदारण्यकोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)
Brihadaranyaka Upanishad with Shankara Bhashya
आदि शङ्कराचार्य द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)
DevanagariSanskritpublished1,402 पृष्ठ
पृष्ठ 461, कुल 1402 में से
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| ब्राह्मण १ ] | शाङ्करभाष्यार्थ | ४५५ |
|---|
| संस्कृत | हिन्दी |
|---|---|
| नन्वपादानपक्षेऽपि पुनरुक्तता- | **पूर्व०—**किंतु अपादान-पक्षको |
| दोषः स्थित एव । | स्वीकार करनेपर भी पुनरुक्तताका दोष तो खड़ा ही रहता है । |
| नैष दोषः, प्रश्नाभ्याम् आत्मनि | **सिद्धान्ती—**यह कोई दोष नहीं |
| क्रियाकारकफलात्मतापोहस्य विव- | है; क्योंकि इन प्रश्नोंसे आत्मामें |
| क्षितत्वात् । इह हि विद्याविद्या- | क्रिया-कारक-फलात्मकताकी निवृत्ति |
| विषयावुपन्यस्तौ । "आत्मेत्येवो- | प्रतिपादन करनी अभीष्ट है । यहाँ |
| पासीत" (१ । ४ । ७) "आ- | विद्या और अविद्या दोनोंहीके |
| त्मानमेवावेत्" (१ । ४ । १०) | विषयोंका वर्णन किया गया है |
| "आत्मानमेव लोकमुपासीत" | "आत्मा है—इस प्रकार उपासना |
| (१ । ४ । १५) इति विद्या- | करे" "आत्माहीको जाना" "आत्म- |
| विषयः । तथा अविद्याविषयश्च | लोककी ही उपासना करे" यह |
| पाङ्क्तं कर्म तत्फलं चान्नत्रयं | विद्याका विषय है। तथा पाङ्क्तकर्म |
| नामरूपकर्मात्मकमिति । तत्रा- | और उसका फल नामरूप-कर्मात्मक |
| विद्याविषये वक्तव्यं सर्वमुक्तम् । | अन्नत्रय—यह अविद्याका विषय |
| विद्याविषयस्त्वात्मा केवल उपन्य- | है। इनमें अविद्याके विषयमें तो |
| स्तो न निर्णीतः । तन्निर्णयाय | दिया, विद्याके विषय आत्माका |
| 'ब्रह्म ते ब्रवाणि' (२ । १ । १) | तो केवल उल्लेख किया है, उसका |
| इति प्रक्रान्तं 'ज्ञापयिष्यामि' | निर्णय नहीं किया । उसका निर्णय |
| (२ । १ । १५) इति च । अत- | करनेके लिये ही 'मैं तुम्हें ब्रह्मका |
| स्तद्ब्रह्म विद्याविषयभूतं ज्ञापयि- | उपदेश करूँगा' इस प्रकार तथा |
| तव्यं याथात्म्यतः । तस्य च | 'ज्ञान कराऊँगा' इस प्रकार प्रक- |
| याथात्म्यं क्रियाकारकफलभेद- | रण उठाया है । अतः विद्याके |
| शून्यमत्यन्तविशुद्धमद्वैतमित्येत- | विषयभूत उस ब्रह्मका यथार्थ |
| रीतिसे ज्ञान कराना है । उसका | |
| यथार्थ स्वरूप क्रिया-कारक-फलरूप | |
| भेदसे रहित, अत्यन्त विशुद्ध और | |
| अद्वैत है—यह बतलाना अभीष्ट है । |