भारतकोश
बृहदारण्यकोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)

बृहदारण्यकोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)

Brihadaranyaka Upanishad with Shankara Bhashya

आदि शङ्कराचार्य द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished1,402 पृष्ठ

पृष्ठ 462, कुल 1402 में से

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पृष्ठ 462
४५६बृहदारण्यकोपनिषद्[अध्याय २

| द्विवक्षितम् । अतस्तदनुरूपौ प्रश्नावुत्थाप्येते श्रुत्या 'क्वैष तदाभूत्' 'कुत एतदागात्' इति ।<br><br>तत्र यत्र भवति तदधिकरणं यद्भवति तदधिकर्त्तव्यम्, तयोश्चाधिकरणाधिकर्त्तव्ययोर्भेदो दृष्टो लोके । तथा यत आगच्छति तदपादानं य आगच्छति स कर्ता तस्मादन्यो दृष्टः । तथा आत्मा क्वाप्यभूदन्यस्मिन्नन्यः कुतश्चिदागादन्यस्मादन्यः केनचिद्भिन्नेन साधनान्तरेणेत्येवं लोकवत्प्राप्ता बुद्धिः । सा प्रतिवचनेन निवर्तयितव्येति । नायमात्मा अन्योऽन्यत्राभूदन्यो वा अन्यस्मादागतः साधनान्तरं वा आत्मन्यस्ति । किं तर्हि ? स्वात्मन्येवाभूत् "स्वम् (आत्मानम्) अपीतो भवति" (छा० उ० ६।८। १) "सता सोम्य तदा सम्पन्नो भवति" (छा० उ० ६ | इसलिये उसके अनुरूप ही श्रुति 'उस समय यह कहाँ था ?' और 'यह कहाँसे आया ?'—इन दो प्रश्नोंको उठाती है ।<br><br>उनमें, जहाँ रहता है वह अधिकरण होता है और जो रहता है वह अधिकर्त्तव्य होता है । लोकमें उन अधिकरण और अधिकर्त्तव्योंका भेद देखा गया है । इसी प्रकार जहाँसे आता है वह अपादान होता है और जो आता है वह कर्ता उससे भिन्न देखा जाता है । इस प्रकार आत्मा किसी अन्यमें उससे भिन्नरूपमें था और किसी अन्यस्थानसे उससे भिन्न रूपसे ही किसी भिन्न साधनान्तरके द्वारा आया है—इस प्रकार लोकवत् ऐसी बुद्धि प्राप्त होती है । इसका उत्तर देकर निराकरण करना है । [ अर्थात् यह बतलाना है कि ] यह आत्मा न तो अन्यरूपसे किसी अन्यस्थानमें अथवा न यह अन्यरूपसे अन्यके पाससे आया है और न आत्मामें कोई अन्य साधन ही है । तो फिर क्या बात है ?—यह अपने स्वरूपमें ही था; जैसा कि "स्वात्माको प्राप्त हो जाता है", "हे सोम्य ! उस समय यह सत्‌से सम्पन्न (संयुक्त) हो जाता |