बृहदारण्यकोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)

बृहदारण्यकोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)
Brihadaranyaka Upanishad with Shankara Bhashya
आदि शङ्कराचार्य द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)
DevanagariSanskritpublished1,402 पृष्ठ
पृष्ठ 463, कुल 1402 में से
संदर्भ में पढ़ेंपृष्ठ 463
ब्राह्मण १ ] शाङ्करभाष्यार्थ [ ४५७
| (८।१) "प्राज्ञेनात्मना सम्परिष्वक्तः' (बृ० उ० ४।३।२१) "परे आत्मनि सम्प्रतिष्ठते" (प्र० उ० ४।७) इत्यादि-श्रुतिभ्यः। अत एव नान्योऽन्यस्मादागच्छति। तच्छ्रुत्यैव प्रदर्श्यते 'अस्मादात्मनः' इति। आत्मव्यतिरेकेण वस्त्वन्तराभावात्। | है", "प्राज्ञात्मासे सम्यक् प्रकारसे आलिङ्गित रहता है", "परमात्मामें सम्यक् प्रकारसे स्थित हो जाता है" इत्यादि श्रुतियोंसे सिद्ध होता है। अतः अन्य आत्मा किसी अन्यके पाससे नहीं आता। यह बात 'इस आत्मासे' इत्यादि रूपसे श्रुति ही प्रदर्शित करती है; क्योंकि आत्मासे भिन्न वस्तुकी तो सत्ता ही नहीं है। |
| नन्वस्ति प्राणाद्यात्मव्यतिरिक्तं वस्त्वन्तरम्। | पूर्व०—आत्मासे भिन्न प्राणादि वस्तुएँ हैं तो? |
| न, प्राणादेस्तत एव निष्पत्तेः। | सिद्धान्ती—नहीं, क्योंकि प्राणादिकी निष्पत्ति तो उसीसे होती है। |
| तत्कथम् ? | पूर्व०—सो किस प्रकार? |
| इत्युच्यते, तत्र दृष्टान्तः— | सिद्धान्ती—बतलाते हैं, उसमें यह दृष्टान्त है— |
आत्मासे जगत्की उत्पत्तिमें ऊर्णनाभि और अग्नि-विस्फुलिङ्गका दृष्टान्त
स यथोर्णनाभिस्तन्तुनोच्चरेद्यथाग्नेः क्षुद्रा विस्फुलिङ्गा व्युच्चरन्त्येवमेवास्मादात्मनः सर्वे प्राणाः सर्वे लोकाः सर्वे देवाः सर्वाणि भूतानि व्युच्चरन्ति तस्योपनिषत्सत्यस्य सत्यमिति प्राणा वै सत्यं तेषामेष सत्यम् ॥ २० ॥
जिस प्रकार वह ऊर्णनाभि (मकड़ा) तन्तुओंपर ऊपरकी ओर जाता है तथा जैसे अग्निसे अनेकों क्षुद्र चिनगारियाँ उड़ती हैं, उसी प्रकार इस आत्मासे समस्त प्राण, समस्त लोक, समस्त देवगण और समस्त भूत विविध रूपसे उत्पन्न होते हैं। 'सत्यका सत्य' यह उस आत्माकी उपनिषद् है। प्राण ही सत्य है। उन्हींका यह सत्य है ॥ २० ॥