बृहदारण्यकोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)
Brihadaranyaka Upanishad with Shankara Bhashya
आदि शङ्कराचार्य द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)
ब्राह्मण ५ ] शाङ्करभाष्यार्थ [ ३२९
ब्राह्मण ५ ] शाङ्करभाष्यार्थ [ ३२९
| गृहिणा वैश्वदेवाख्यमन्नं यदहन्यहनि निरूप्यत इति केचित्, तन्न, सर्वभोक्तृसाधारणत्वं वैश्वदेवाख्यस्यान्नस्य न सर्वप्राणभृद्भुज्यमानान्नवत्प्रत्यक्षम्, नापि 'यदिदमद्यते' इति तद्विषयं वचनमनुकूलम्। सर्वप्राणभृद्भुज्यमानान्नान्तःपातित्वाच्च वैश्वदेवाख्यस्य युक्तं श्वचाण्डालाद्याद्यस्यान्नस्य ग्रहणम्, वैश्वदेवव्यतिरेकेणापि श्वचाण्डालाद्याद्यान्नदर्शनात्, तत्र युक्तम्, 'यदिदमद्यते' इति वचनम्। यदि हि तन्न गृह्येत, साधारणशब्देन पित्रासृष्टत्वाविनियुक्तत्वे तस्य प्रसज्येया- | किन्हीं-किन्हीं (भर्तृप्रपञ्च आदि) का कथन है कि गृहस्थद्वारा नित्यप्रति जो वैश्वदेवनामक अन्न निकाला जाता है, वही साधारण अन्न है। यह मत ठीक नहीं, क्योंकि समस्त प्राणियोंद्वारा खाये जानेवाले अन्नके समान वैश्वदेवसंज्ञक अन्नका समस्त भोक्ताओंके लिये साधारण होना प्रत्यक्ष नहीं है और न उसके विषयमें 'यदिदमद्यते' (जो यह खाया जाता है) यह वचन ही अनुकूल है। इसके सिवा वैश्वदेवसंज्ञक अन्न तो समस्त प्राणियोंद्वारा खाये जानेवाले अन्नके अन्तर्गत ही है, अतः वहाँ कुत्ते और चाण्डालादिद्वारा खाये जानेवाले अन्नको ही ग्रहण करना उचित है, क्योंकि वैश्वदेवसे अतिरिक्त भी कुत्ते और चाण्डालादिके खानेयोग्य अन्न देखा जाता है, अतः वहाँ 'जो यह अन्न खाया जाता है' यह वचन उचित होगा और यदि साधारणशब्दसे उस अन्नको ग्रहण नहीं किया जायगा तो 'पिताने उसकी सृष्टि नहीं की और उसका विनियोग भी नहीं किया' ऐसे कथनका प्रसङ्ग उपस्थित होगा। पर वास्तव- |
३३० | बृहदारण्यकोपनिषद् | [अध्याय १
| ३३० | बृहदारण्यकोपनिषद् | [अध्याय १ |
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| संस्कृत-भाष्यम् | हिन्दी-अनुवाद |
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| ताम्। इष्यते हि तत्सृष्टत्वं तद्विनियुक्तत्वं च सर्वस्यान्नजातस्य। | में समस्त अन्न उसीने रचे हैं और उसीने उनका विनियोग किया है—यही सिद्धान्त यहाँ इष्ट है। |
| न च वैश्वदेवाख्यं शास्त्रोक्तं कर्म कुर्वतः पाप्मनोऽविनिवृत्तिर्युक्ता, न च तस्य प्रतिषेधोऽस्ति, न च मत्स्यबन्धनादिकर्मवत्स्वभावजुगुप्सितमेतत्, शिष्टनिर्वर्त्यत्वात्, अकरणे च प्रत्यवायश्रवणात्। इतरत्र च प्रत्यवायोपपत्तेः “अहमन्नमन्नमदन्तमा३द्मि” (तै० उ० ३।१०।६) इति मन्त्रवर्णात्। | इसके सिवा वैश्वदेवसंज्ञक शास्त्रोक्त कर्म करनेवाले पुरुषका पापसे निवृत्त न होना युक्तिसङ्गत नहीं है। तथा [शास्त्रोंमें] बलि-वैश्वदेवका कहीं भी प्रतिषेध नहीं किया गया है। मछली पकड़ने आदि कर्मोंके समान यह स्वभावतः निन्दनीय भी नहीं है, क्योंकि यह शिष्ट पुरुषोंद्वारा निष्पन्न होनेवाला है और इसके न करनेपर प्रत्यवाय भी सुना गया है। तथा “मैं अन्न ही [अतिथि आदिको बिना दिये] अन्न भक्षण करनेवालेको भक्षण कर जाता हूँ” इस मन्त्रके अनुसार अन्यत्र (वैश्वदेवान्नसे भिन्न अन्न भक्षण करनेमें) ही प्रत्यवाय होना सम्भव है। |
| 'द्वे देवानभाजयत्' इति मन्त्रपदम्, (द्वे देवान्ने) ये द्वे अन्ने सृष्ट्वा देवानभाजयत्। के ते द्वे ? इत्युच्यते—हुतं च प्रहुतं च। हुतमित्यग्नौ हवनम्, प्रहुतं हुत्वा बलिहरणम्। यस्माद् द्वे एते अन्ने हुतप्रहुते | 'द्वे देवानभाजयत्' यह मन्त्रका पद है। पिताने जिन दो अन्नोंको रचकर देवताओंको बाँटा वे दो कौन-से हैं? सो बतलाया जाता है—हुत और प्रहुत। 'हुत' यह अग्निमें हवन करना है, और 'प्रहुत' हवन करके बलिहरण<sup>१</sup> करना है। क्योंकि पिताने ये दो अन्न हुत और प्रहुत |
१. देवताओंके लिये भाग निकालना 'बलिहरण' कहलाता है।
ब्राह्मण ५] शाङ्करभाष्यार्थ ३३१
ब्राह्मण ५] शाङ्करभाष्यार्थ ३३१
| शाङ्करभाष्य | भाष्यार्थ |
|---|---|
| देवानभाजयत्पिता। तस्मादेतद्यर्ह्यपि गृहिणः काले देवेभ्यो जुह्वति देवेभ्य इदमन्नमस्माभिर्दीयमानमिति मन्वाना जुह्वति, प्रजुह्वति च हुत्वा बलिहरणं च कुर्वत इत्यर्थः । | देवताओंको दिये थे, इसलिये इस समय भी गृहस्थलोग समयपर देवताओंके लिये होम करते हैं; अर्थात् 'यह अन्न हमारे द्वारा देवताओंको दिया जाता है'—ऐसा मानते हुए हवन करते हैं तथा 'प्रजुह्वति च' अर्थात् हवन करके बलिहरण भी करते हैं। |
| अथो अप्यन्य आहुर्द्वे अन्ने पित्रा देवेभ्यः प्रत्ते न हुतप्रहुते, किं तर्हि ? दर्शपूर्णमासाविति । द्वित्वश्रवणाविशेषादत्यन्तप्रसिद्धत्वाच्च हुतप्रहुते इति प्रथमः पक्षः। यद्यपि द्वित्वं हुतप्रहुतयोः सम्भवति, तथापि श्रौतयोरेव तु दर्शपूर्णमासयोर्देवान्नत्वं प्रसिद्धतरम्, मन्त्रप्रकाशितत्वात् । गुणप्रधानप्राप्तौ च प्रधाने प्रथमतरा अवगतिः, दर्शपूर्णमासयोश्च प्राधान्यं हुतप्रहुतापेक्षया । तस्मात्तयोरेव ग्रहणं युक्तम् 'द्वे देवानभाजयत्' इति । | तथा किन्हीं दूसरोंका ऐसा भी कहना है कि पिताके द्वारा देवताओंको दिये हुए दो अन्न हुत और प्रहुत नहीं हैं; तो कौन-से हैं ? दर्श और पूर्णमास । द्विवचन-श्रवणमें समानता होनेसे और अत्यन्त प्रसिद्ध होनेसे हुत और प्रहुत ही वे अन्न हैं—यह तो पहला पक्ष है। यद्यपि हुत और प्रहुतका द्वित्व सम्भव है, तो भी उनकी अपेक्षा श्रुतिप्रतिपादित दर्श और पूर्णमासका ही देवान्न होना अधिक प्रसिद्ध है, क्योंकि वे मन्त्रोक्त हैं। इसके सिवा जब गौण और प्रधान अर्थकी प्राप्ति हो तो पहले प्रधान अर्थका ही ज्ञान होगा, और हुत-प्रहुतकी अपेक्षा दर्शपूर्णमासकी ही प्रधानता है। अतः 'द्वे देवानभाजयत्' इस वाक्यसे उन्हींको ग्रहण करना उचित है [—यह दूसरा पक्ष है]। |
३३२ | बृहदारण्यकोपनिषद् | [ अध्याय १
| ३३२ | बृहदारण्यकोपनिषद् | [ अध्याय १ |
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| संस्कृत-भाष्यम् | हिन्दी-अनुवाद |
|---|---|
| यस्माद्देवार्थमेते पित्रा प्रक्लृप्ते दर्शपूर्णमासाख्ये अन्ने, तस्मात्तयोर्देवार्थत्वाविघाताय नेष्टियाजुक इष्टियजनशीलः; इष्टिशब्देन किल काम्या इष्टयः, शातपथीयं प्रसिद्धिः; ताच्छील्यप्रत्ययप्रयोगात्काम्येष्टियजनप्रधानो न स्यादित्यर्थः । | क्योंकि ये दर्श और पूर्णमाससंज्ञक अन्न पिताने देवताओंके लिये बनाये हैं, इसलिये उनकी देवार्थताका विघात न करनेके लिये इष्टियाजुक--इष्टियजनशील नहीं होना चाहिये। 'इष्टि' शब्दसे यहाँ काम्य इष्टियाँ (यज्ञ) समझनी चाहिये, यह शतपथ ब्राह्मणकी प्रसिद्धि है। 'इष्टियाजुकः' इस पदमें 'उकञ्' प्रत्यय ताच्छील्य (तत्स्वभावता) अर्थमें प्रयुक्त है, अतः इसका तात्पर्य यही है कि प्रधानतया कामनायुक्त यज्ञोंका यजन नहीं करना चाहिये। |
| पशुभ्य एकं प्रायच्छदिति—<br>(पश्वन्नमेकम्) यत्पशुभ्य एकं प्रायच्छत्पिता किं पुनस्तदन्नम्? तत्पयः। कथं पुनरवगम्यते पशवोऽस्यान्नस्य स्वामिनः? इत्यत आह—पयो ह्यग्रे प्रथमं यस्मान्मनुष्याश्च पशवश्च पयः एवोपजीवन्तीति । उचितं हि 'तेषां तदन्नम्' अन्यथा कथं तदेवाग्रे नियमेनोपजीवेयुः ? | 'पशुभ्य एकं प्रायच्छत्' इति—<br>पिताने पशुओंको जो एक अन्न दिया था, वह कौन-सा है? वह दुग्ध है। किंतु यह कैसे जाना जाता है कि इस अन्नके स्वामी पशु हैं—ऐसा प्रश्न होनेपर कहते हैं—क्योंकि मनुष्य और पशु पहले यानी आरम्भमें दुग्धके आश्रय ही जीवन धारण करते हैं। अतः 'यह उनका अन्न है' ऐसा कहना उचित ही है। नहीं तो वे आरम्भमें नियमसे उसीके आश्रय जीवन-धारण क्यों करते ? |
| कथमग्रे तदेवोपजीवन्ति ? इत्यु- | वे पहले उसीके आश्रय किस प्रकार जीवन धारण करते हैं? सो |
ब्राह्मण ५ ] शाङ्करभाष्यार्थ ३३३
ब्राह्मण ५ ] शाङ्करभाष्यार्थ ३३३
| संस्कृत | हिन्दी |
|---|---|
| च्यते—मनुष्याश्च पशवश्च यस्मात्तेनैवान्नेन वर्तन्तेऽद्यत्वेऽपि, यथा पित्रा आदौ विनियोगः कृतस्तथा। | बतलाया जाता है—पिताने आरम्भमें जैसा विनियोग किया था, उसीके अनुसार आज भी मनुष्य और पशुगण उसी अन्नके आश्रय रहते हैं। |
| तस्मात्कुमारं बालं जातं घृतं वा त्रैवर्णिका जातकर्मणि जातरूपसंयुक्तं प्रतिलेहयन्ति प्राशयन्ति। स्तनं वानुधापयन्ति पश्चात् पाययन्ति । यथासम्भवमन्येषाम् स्तनमेवाग्रे धापयन्ति मनुष्येभ्योऽन्येषां पशूनाम्। | इसीसे ब्राह्मण, क्षत्रिय और वैश्य-इन तीन वर्णोंके लोग नवजात कुमारको जातकर्मसंस्कारके समय सुवर्णसंयुक्त (सुवर्णकी शलाकादिसे) घृत चटाते हैं, अथवा स्तनपान कराते हैं, अर्थात् उसके पीछे दुग्धपान कराते हैं। तथा जातकर्मके अनधिकारी दूसरे मनुष्योंके उत्पन्न हुए बालकको एवं मनुष्योंसे भिन्न पशुओंके बछड़ोंको भी यथासम्भव पहले स्तन ही चुसाते हैं। |
| अथ वत्सं जातमाहुः 'कियत्प्रमाणो वत्सः?' इत्येवं पृष्टाः सन्तोऽतृणाद इति । नाद्यापि तृणमत्ति, अतीव बालः, पयसैवाद्यापि वर्तत इत्यर्थः । | जब बछड़ा उत्पन्न होता है, तो उसके विषयमें यह पूछे जानेपर कि 'बछड़ा कितना बड़ा है ?' यही कहते हैं कि 'अभी घास खानेवाला नहीं हुआ'। तात्पर्य यह है कि अभीतक घास नहीं खाता, बहुत ही छोटा है, केवल दूध पीकर ही रहता है। |
| यच्चाग्रे जातकर्मादौ घृतमुपजीवन्ति, यच्चेतरे पय एव, तत्सर्वथापि पय एवोपजीवन्ति; घृतस्यापि पयोविकारत्वात्पयस्त्वमेव। | इस प्रकार जो पहले जातकर्म आदिमें घृतके आश्रय जीवन धारण करते हैं और जो दूसरे जीव दुग्धके ही आश्रय रहते हैं वे सब सर्वथा दुग्धके ही उपजीवी हैं; क्योंकि दुग्धका विकार होनेके कारण घृत भी दुग्धरूप ही है। |
| कस्मात्पुनः सप्तमं सत्पश्वन्नं चतु- | किंतु [मन्त्रमें] पश्वन्न सातवाँ होनेपर भी यहाँ (ब्राह्मणमें) इसकी |
३३४ | बृहदारण्यकोपनिषद् | [ अध्याय १
| ३३४ | बृहदारण्यकोपनिषद् | [ अध्याय १ |
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| र्थत्वेन व्याख्यायते ? कर्मसाधन- | चतुर्थरूपसे व्याख्या क्यों की गयी है ? [उत्तर--] क्योंकि यह कर्मका | | त्वात् । कर्म हि पयःसाधनाश्रयं | साधन है। अग्निहोत्रादि कर्म दुग्ध- | | अग्निहोत्रा दि । तच्च कर्म साधनं | रूप साधनके ही आश्रित हैं। और वह कर्म आगे कहे जानेवाले साध्य- | | वित्तसाध्यं वक्ष्यमाणस्यान्नत्रयस्य | भूत तीन अन्नोंका वित्तसाध्य साधन है जैसे कि पहले बतलाये | | साध्यस्य, यथा दर्शपूर्णमासौ | हुए दर्श और पूर्णमास नामक अन्न । अतः कर्मके पक्षमें होनेके कारण | | पूर्वोक्तावन्ने । अतः कर्मपक्षत्वात् | इसका कर्मके साथ मिलकर उपदेश किया गया है । [ दर्श-पूर्णमासके | | कर्मणा सह पिण्डीकृत्योपदेशः। | साथ ] साधनत्वमें समानता होनेके कारण इसका उनके साथ अर्थमें | | साधनत्वाविशेषादर्थसम्बन्धादा- | भी सम्बन्ध है, इसलिये केवल पाठ- | | नन्तर्यमकारणमिति च । व्याख्याने | का आनन्तर्य इनके अर्थक्रममें अन्तर डालनेका कारण नहीं हो सकता । | | प्रतिपत्तिसौकर्याच्च । सुखं हि | इस प्रकार व्याख्या करनेसे समझने- में भी सुगमता होती है । साधनभूत | | नैरन्तर्येण व्याख्यातुं शक्यन्ते- | अन्नोंकी व्याख्या एक साथ सुगमता- से की जा सकती है और इस प्रकार | | ऽन्नानि व्याख्यातानि च सुखं | व्याख्या करनेपर अनायास ही उनकी प्रतीति हो जाती है ।¹ | | प्रतीयन्ते । | | | तस्मिन्सर्वं प्रतिष्ठितं यच्च | जो कोई प्राणनक्रिया करता है और जो नहीं करता वह सब उसीमें |
१. चार अन्न साधन हैं और तीन साध्य हैं; अतः उन साधन और साध्य-भूत अन्नोंका विभाग करके व्याख्या करनेसे वक्ता, श्रोता दोनोंके समझनेमें सुविधा होगी, इसीसे यहाँ पाठक्रमका अतिक्रमण करके पश्वन्नकी व्याख्या की गयी है ।
ब्राह्मण ५ ] | शाङ्करभाष्यार्थ | ३३५
| ब्राह्मण ५ ] | शाङ्करभाष्यार्थ | ३३५ |
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| शाङ्करभाष्यम् | भाष्यार्थ |
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| [पयोद्रव्यस्य सर्वप्रतिष्ठात्वनिरूपणम्]<br>प्राणिति यच्च नेत्यस्य कोऽर्थः ? इत्युच्यते—तस्मिन्नपशन्ने पयसि सर्वमध्यात्मधिभूताधिदैवलक्षणं कृत्स्नं जगत्प्रतिष्ठितं यच्च प्राणिति प्राणचेष्टावद्यच्च न स्थावरं शैलादि । तत्र हिशब्देनैव प्रसिद्धावद्योतकेन व्याख्यातम् । कथं पयोद्रव्यस्य सर्वप्रतिष्ठात्वम् ? कारणत्वोपपत्तेः । कारणत्वं चाग्निहोत्रादिकर्मसमवायित्वम् । अग्निहोत्राद्याहुतिविपरिणामात्मकं च जगत्कृत्स्नमिति श्रुतिस्मृतिवादाः शतशो व्यवस्थिताः । अतो युक्तमेव हिशब्देन व्याख्यानम् । | प्रतिष्ठित है—इस वाक्यका क्या तात्पर्य है ? सो बतलाया जाता है । उस दुग्धरूप पश्वन्नमें, जो प्राणन करता है अर्थात् प्राणचेष्टासे युक्त है और जो स्थावर पर्वतादि वैसे नहीं हैं, वे सब यानी अध्यात्म, अधिभूत और अधिदैवरूप सारा ही जगत् प्रतिष्ठित है । यहाँ प्रसिद्धिके द्योतक ‘हि’ शब्दसे ही इसकी व्याख्या की गयी है । किंतु दुग्ध द्रव्य सबकी प्रतिष्ठा किस प्रकार है ? क्योंकि उसमें कारणत्वकी उपपत्ति है । अग्निहोत्रादि कर्मसे सम्बन्ध होना ही उसका कारणत्व है । अग्निहोत्रादिकी आहुतियोंका विपरिणाम रूप ही सारा जगत् है—इस विषयमें सैकड़ों श्रुति-स्मृतिवाद व्यवस्थित हैं । अतः ‘हि’ शब्दसे इसकी व्याख्या करना उचित ही है । |
| यत्तद्ब्राह्मणान्तरेष्विदमाहुः—<br>[कथं संवत्सरं पयसा जुह्वदपमृत्युं जयति]<br>संवत्सरं पयसा जुह्वदप पुनर्मृत्युं जयतीति, संवत्सरेण किल त्रीणि षष्टिशतान्याहुतीनां सप्त च शतानि विंशतिश्चेति | ब्राह्मणान्तरोंमें जो ऐसा कहा है कि एक संवत्सरपर्यन्त दुग्धसे हवन करनेवाला पुरुष अपमृत्युको जीत लेता है, सो यहाँ संवत्सरसे तीन सौ साठ अथवा सात सौ बीस आहुतियाँ अभिप्रेत हैं।¹ वे संवत्सरके दिन-रात |
१ संवत्सरमें तीन सौ साठ दिन होते हैं, प्रत्येक दिनके दोनों समयके होमकी आहुतियोंको एक मानकर समस्त आहुतियाँ भी तीन सौ साठ होंगी और प्रत्येक समयकी एक-एक आहुति माननेसे उनकी संख्या सात सौ बीस होगी ।
३३६ | बृहदारण्यकोपनिषद् | [ अध्याय १
| ३३६ | बृहदारण्यकोपनिषद् | [ अध्याय १ |
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| याजुष्मतीरिष्टका अभिसम्पद्यमानाः संवत्सरस्य चाहोरात्राणि, संवत्सरमग्निं प्रजापतिमाप्नुवन्ति; एवं कृत्वा संवत्सरं जुह्वदपजयति पुनर्मृत्युम्, इतः प्रेत्य देवेषु सम्भूतः पुनर्न म्रियत इत्यर्थः। <br><br> इत्येवं ब्राह्मणवादा आहुः, न तथा विद्यान्न तथा द्रष्टव्यम्; यदहरेव जुहोति तदहः पुनर्मृत्युमपजयति, न संवत्सराभ्यासमपेक्षते। एवं विद्वान्सन्, यदुक्तम्— पयसि हीदं सर्वं प्रतिष्ठितं पयआहुतिविपरिणामात्मकत्वात्सर्वस्येति, तदेकेनैवाह्ना जगदात्मत्वं प्रतिपद्यते; तदुच्यते— अपजयति पुनर्मृत्युं पुनर्मरणम्, | यजुर्वेदोक्त इष्टकारूप होकर संवत्सररूप अग्नि प्रजापतिको प्राप्त करते हैं;¹ ऐसी भावना करके एक वर्षतक हवन करनेवाला पुनर्मृत्युको जीत लेता है, अर्थात् यहाँसे मरकर देवताओंमें जन्म लेकर फिर नहीं मरता। <br><br> —ऐसा ब्राह्मणवाद कहते हैं, किंतु ऐसा नहीं समझना चाहिये, ऐसी दृष्टि नहीं रखनी चाहिये; क्योंकि पुरुष जिस दिन भी [दुग्धसे] हवन करता है, उसी दिन पुनर्मृत्युको परास्त कर देता है, इसके लिये एक वर्षतक अभ्यास करनेकी अपेक्षा नहीं रखता। अतः इस प्रकार जानकर अर्थात् ऊपर जो कहा है कि सब दुग्धकी आहुतियोंका परिणामरूप होनेके कारण यह सब दुग्धमें ही प्रतिष्ठित है, वह वैसा ही है—ऐसा जाननेवाला पुरुष एक ही दिन आहुतिप्रदान करनेसे जगत्के आत्मत्वको प्राप्त हो जाता है। यही बात श्रुति कहती है कि वह पुनर्मृत्यु यानी दूसरी बार मरनेको |
१. अर्थात् जो साधक उन आहुतियोंमें यजुर्वेदोक्त इष्टका-दृष्टि कर उन्हें संवत्सरके अवयवभूत अहोरात्र मानकर दुग्धसे हवन करता है, उसे संवत्सरात्मक प्रजापतिकी प्राप्ति होती है। याजुषी इष्टकाओंकी संख्या भी तीन सौ साठ ही है, अतः उनकी आहुतियों और अहोरात्रसे संख्यामें समानता है।
ब्राह्मण ५ ] शाङ्करभाष्यार्थ ३३७
ब्राह्मण ५ ] शाङ्करभाष्यार्थ ३३७
| सकृन्मृत्वाविद्वाञ्शरीरेण वियुज्य सर्वात्मा भवति न पुनर्मरणाय परिच्छिन्नं शरीरं गृह्णातीत्यर्थः । | जीत लेता है। अर्थात् वह विद्वान् एक बार मरकर—शरीरसे विलग होकर सर्वात्मा हो जाता है, पुनः मरनेके लिये परिच्छिन्न शरीर ग्रहण नहीं करता। |
| कः पुनर्हेतुः सर्वात्माप्त्या मृत्युमपजयति? इत्युच्यते—सर्वं समस्तं हि यस्माद्देवेभ्यः सर्वेभ्योऽन्नाद्यमन्नमेव तदाद्यं च सायंप्रातराहुतिप्रक्षेपेण प्रयच्छति। तद्युक्तं सर्वमाहुतिमयमात्मानं कृत्वा सर्वदेवान्नरूपेण सर्वैर्देवैरेकात्मभावं गत्वा सर्वदेवमयो भूत्वा पुनर्न म्रियत इति । | किंतु वह सर्वात्मप्राप्तिके द्वारा जो मृत्युको जीत लेता है, इसका क्या कारण है? यह बतलाया जाता है—क्योंकि वह सायंकाल और प्रातःकालके आहुतिदानके द्वारा समस्त देवताओंको सम्पूर्ण अन्नाद्य—जो अन्न और आद्य (भक्ष्य) भी है—देता है। अतः अपनेको सर्वाहुतिमय करके समस्त देवताओंके अन्नरूपसे समस्त देवताओंके साथ एकत्वको प्राप्त होकर वह सर्वदेवमय होकर पुनः नहीं मरता—ऐसा कथन उचित हो है। |
| अथैतदप्युक्तं ब्राह्मणेन— | ब्राह्मणने एक बात यह भी कही है— |
| “ब्रह्म वै स्वयम्भु तपोऽतप्यत, तदैक्षत न वै तपस्यानन्त्यमस्ति, हन्ताहं भूतेष्वात्मानं जुह्वानि भूतानि चात्मनीति, तत्सर्वेषु भूतेष्वात्मानं हुत्वा भूतानि चात्मनि सर्वेषां भूतानां श्रेष्ठ्यं | "स्वयम्भू ब्रह्म (हिरण्यगर्भ) ने तप (कर्म) किया। उसने विचार किया निश्चय ही इस तपमें अनन्तत्व (अमृतत्व) नहीं है। अच्छा तो मैं अपनेको भूतोंमें हवन करूँ और भूतोंको अपनेमें। अतः उसने समस्त भूतोंमें अपनेको और समस्त भूतोंको अपनेमें हवन कर समस्त भूतोंका |
बृ० उ० २२—
३३८ | बृहदारण्यकोपनिषद् | [ अध्याय १
| ३३८ | बृहदारण्यकोपनिषद् | [ अध्याय १ |
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| संस्कृत-भाष्यम् | हिन्दी-अनुवाद |
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| स्वाराज्यमाधिपत्यं पर्येत्" इति। | श्रेष्ठत्व, स्वराज्य और आधिपत्य प्राप्त किया।" |
| अन्नानामक्षय-त्वोपपादनम्<br><br>कस्मात्तानि न क्षीयन्तेऽद्यमानानि सर्वदेति। यदा पित्रा अन्नानि सृष्ट्वा सप्त पृथक्पृथग्भोक्तृभ्यः प्रदत्तानि, तदाप्रभृत्यैव तैर्भोक्तृभिरद्यमानानि—तन्निमित्तत्वात्तेषां स्थितेः—सर्वदा नैरन्तर्येण; कृतक्षयोपपत्तेश्च युक्तस्तेषां क्षयः। न च तानि क्षीयमाणानि, जगतोऽविभ्रष्टरूपेणैवावस्थानदर्शनात्। भवितव्यं चाक्षयकारणेन; तस्मात्कस्मात्पुनस्तानि न क्षीयन्त इति प्रश्नः। | अब 'कस्मात्तानि न क्षीयन्तेऽद्यमानानि सर्वदा' इस श्रुतिका अर्थ किया जाता है। जब पिताके द्वारा रचे जाकर सात अन्न अलग-अलग भोक्ताओंको बाँटे गये थे, तभीसे वे सर्वदा—निरन्तर उन भोक्ताओंद्वारा खाये जा रहे हैं; क्योंकि उन अन्नोंके कारण ही उनकी स्थिति है। कृतक वस्तुका क्षय होना उचित ही है, अतः उनका भी क्षय होना युक्तियुक्त ही है। किंतु वे क्षय होते नहीं जान पड़ते, क्योंकि संसार अक्षयरूपसे ही स्थित दिखायी देता है। उनके इस अक्षयका कोई कारण होना चाहिये; अतः यह प्रश्न होता है कि वे क्षीण क्यों नहीं होते ? |
| तस्येदं प्रतिवचनम्—'पुरुषो वा अक्षितिः'। यथासौ पूर्वमन्नानां स्रष्टासीत्पिता मेधया जायादिसम्बन्धेन च पाङ्क्तकर्मणा भोक्ता च, तथा येभ्यो दत्तान्यन्नानि तेऽपि तेषामन्नानां भोक्तारोऽपि सन्तः पितर एव, मेधया तपसा | इसका उत्तर यह है—'पुरुषो वा अक्षितिः'। जिस प्रकार पहले यह पिता विज्ञान और स्त्री आदिके सम्बन्धसे होनेवाले पाङ्क्तकर्मद्वारा अन्नोंका रचयिता और भोक्ता था, उसी प्रकार जिन्हें वे अन्न दिये गये हैं वे भी उन अन्नोंके भोक्ता होते हुए भी उनके पिता ही हैं; क्योंकि वे भी विज्ञान और कर्मके द्वारा उन अन्नोंको |
ब्राह्मण ५ ] शाङ्करभाष्यार्थ ३३९
ब्राह्मण ५ ] शाङ्करभाष्यार्थ ३३९
| शाङ्करभाष्यम् | भाष्यार्थ |
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| च यतो जनयन्ति तान्यन्नानि। तदेतदभिधीयते पुरुषो वै योऽन्नानां भोक्ता सोऽक्षिति-रक्षयहेतुः। | उत्पन्न करते हैं। इसीसे यह कहा जाता है कि पुरुष, जो अन्नोंका भोक्ता है, वह अक्षिति यानी उनके अक्षयका कारण है। |
| कथमस्याक्षितित्वम्? इत्युच्यते— स हि यस्मादिदं भुज्यमानं सप्तविधं कार्यकारणलक्षणं क्रियाफलात्मकं पुनः पुनर्भूयो भूयो जनयत उत्पादयति धिया धिया तत्तत्कालभाविन्या तया तया प्रज्ञया, कर्मभिश्च वाङ्मनःकायचेष्टितैः; यद्यदि ह यद्येतत्सप्तविधमन्नमुक्तं क्षणमात्रमपि न कुर्यात्प्रज्ञया कर्मभिश्च, ततो विच्छिद्येत भुज्यमानत्वात्सातत्येन क्षीयेत ह। तस्माद्यथैवायं पुरुषो भोक्ता अन्नानां नैरन्तर्येण, यथाप्रज्ञं यथाकर्म च करोत्यपि। तस्मात्पुरुषोऽक्षितिः सातत्येन कर्तृत्वात्। तस्माद् भुज्यमानान्यप्यन्नानि न क्षीयन्त इत्यर्थः। | उसका अक्षितित्व किस प्रकार है? सो बतलाया जाता है—क्योंकि वह इस खाये जानेवाले कार्य-करण-रूप एवं कर्मफलात्मक सात प्रकारके अन्नको पुनः-पुनः—बार-बार 'धिया धिया'—तत्तत् कालमें होनेवाली तत्तद्बुद्धिसे और कर्मों यानी वाक्, मन और शरीरकी चेष्टाओंसे उत्पन्न कर देता है। यदि वह इस उपर्युक्त सप्तविध अन्नको विज्ञान और कर्मोंके द्वारा एक क्षण भी उत्पन्न न करे, तो निरन्तर खाये जानेके कारण वह विच्छिन्न यानी क्षीण हो जाय। अतः जिस प्रकार वह पुरुष अन्नोंका निरन्तर भोक्ता है, उसी प्रकार अपनी बुद्धि और कर्मके अनुसार उन्हें उत्पन्न भी करता है। अतः निरन्तर कर्त्ता होनेके कारण पुरुष अक्षिति है। इसीसे निरन्तर खाये जानेपर भी वे अन्न क्षीण नहीं होते—ऐसा इसका तात्पर्य है। |
| अतः प्रज्ञाक्रियालक्षणप्रबन्धारूढः सर्वो लोकः साध्यसाधन- | अतः प्रज्ञा और क्रियासे लक्षित परम्परापर आरूढ़ हो साध्य तथा साधनरूपसे वर्तमान एवं कर्मका |
३४० | बृहदारण्यकोपनिषद् | [ अध्याय १
| ३४० | बृहदारण्यकोपनिषद् | [ अध्याय १ |
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| लक्षणः क्रियाफलात्मकः संहतानेकप्राणिकर्मवासनासन्तानाविष्टब्धत्वात्क्षणिकोऽशुद्धोऽसारो नदीस्रोतःप्रदीपसन्तानकल्पः कदलीस्तम्भवदसारः फेनमायामरीच्यम्भःस्वप्नादिसमस्तदात्मगतदृष्टीनामविकीर्यमाणो नित्यः सारवानिव लक्ष्यते । <br><br> तदेतद्वैराग्यार्थमुच्यते—धिया धिया जनयते कर्मभिर्यद्वैतन्न कुर्यात्क्षीयत हेति—विरक्तानां ह्यस्माद्ब्रह्मविद्या आरब्धव्या चतुर्थप्रमुखेनेति । <br><br> यो वैतामक्षितिं वेदेति; <br> [उपासनफलम्] <br> वक्ष्यमाणान्यपि त्रीण्यन्नान्यस्मिन्नवसरे व्याख्यातान्येवेति कृत्वा तेषां याथात्म्यविज्ञानफलमुपसंह्रियते— | फलभूत यह सम्पूर्ण जड-चेतनमय संसार क्षणिक, अशुद्ध, असार, नदीके प्रवाह और दीपककी ज्योतिके समान [अस्थिर], कदलीस्तम्भके समान असार तथा फेन, मृगतृष्णा-जल और स्वप्नादिके समान असत्य होकर भी, जिनकी दृष्टि इसमें आसक्त है, उन बहिर्मुख लोगोंको ही अविकीर्यमाण (स्थिर), नित्य और सारवान्-सा दिखायी देता है; क्योंकि परस्पर मिलकर रहनेवाले नाना प्राणियोंके अनन्त कर्मों एवं उनकी वासनाओंकी परम्परासे आबद्ध हो सुस्थिर जान पड़ता है। <br><br> उससे वैराग्य करानेके लिये ही श्रुति ऐसा कहती है—'धिया धिया जनयते कर्मभिर्यद्वैतन्न कुर्यात्क्षीयत' इत्यादि। जो इससे विरक्त हैं, उन्हींके लिये [इस उपनिषद्के] चौथे अध्यायसे लेकर ब्रह्मविद्या आरम्भ करनी है। <br><br> 'यो वैतामक्षितिं वेद' इस मन्त्रसे, आगे कहे जानेवाले तीन अन्नोंकी भी इस समय व्याख्या कर दी गयी है—ऐसा मानकर उनके यथार्थ स्वरूपके विज्ञानके फलका उपसंहार |
ब्राह्मण ५] शाङ्करभाष्यार्थ ३४१
ब्राह्मण ५] शाङ्करभाष्यार्थ ३४१
| यो वा एताम् अक्षितिम् अक्षयहेतुं <br><br> यथोक्तं वेद, पुरुषो वा अक्षितिः <br><br> स हीदमन्नं धिया धिया जनयते <br><br> कर्मभिर्यद्वैतन्न कुर्यात्क्षीयत हेति। | किया जाता है—जो भी इस अक्षिति अर्थात् ऊपर बतलाये हुए अक्षयके हेतुको कि 'पुरुष ही अक्षिति है, वही तत्तद्बुद्धि और कर्मोंसे इस अन्नको उत्पन्न करता है, यदि वह उत्पन्न न करे तो यह निश्चय क्षीण हो जाय' ऐसा जानता है, [ वह प्रतीकके द्वारा अन्न भक्षण करता है ]। |
| सोऽन्नमत्ति प्रतीकेनेत्यस्यार्थ उच्यते—मुखं मुख्यत्वं प्राधान्यमित्येतत् । प्राधान्येनैवान्नानां पितुः पुरुषस्याक्षितित्वं यो वेद सोऽन्नमत्ति नान्नं प्रति गुणभूतः सन्। यथाज्ञो न तथा विद्वानन्नानामात्मभूतः, भोक्तैव भवति, न भोज्यतामापद्यते । स देवानपिगच्छति स ऊर्जमुपजीवति, देवानपिगच्छति देवात्मभावं प्रतिपद्यते; ऊर्जममृतं चोपजीवतीति यदुक्तं सा प्रशंसा, नापूर्वार्थोऽन्योऽस्ति ॥ २ ॥ | अब 'सोऽन्नमत्ति प्रतीकेन' इस श्रुतिका अर्थ कहा जाता है—मुख—मुख्यत्व अर्थात् प्राधान्यको कहते हैं। जो पुरुष अन्नोंके पिता पुरुषका अक्षितित्व जानता है, वह प्रधानतासे ही अन्न भक्षण करता है, अन्नके प्रति गौण होकर नहीं। अज्ञानीकी तरह ज्ञानवान् अन्नोंका आत्मभूत नहीं होता; वह भोक्ता ही रहता है, भोज्यताको प्राप्त नहीं होता। तथा 'स देवानपिगच्छति स ऊर्जमुपजीवति' वह 'देवानपिगच्छति'—देवात्मभावको प्राप्त होता है और ऊर्जं यानी अमृतका उपजीवी होता है—ऐसा जो कहा है वह उसकी प्रशंसा है, इसका कोई दूसरा अपूर्व अर्थ नहीं है ॥ २ ॥ |
३४२ | बृहदारण्यकोपनिषद् | [अध्याय १
| ३४२ | बृहदारण्यकोपनिषद् | [अध्याय १ |
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आत्माके लिये तीन अन्न और उनका आध्यात्मिक विवेचन
| पाङ्क्तस्य कर्मणः फलभूतानि यानि त्रीण्यन्नान्युपक्षिप्तानि तानि कार्यत्वाद्विस्तीर्णविषयत्वाच्च पूर्वेभ्योऽन्नेभ्यः पृथगुत्कृष्टानि, तेषां व्याख्यानार्थ उत्तरो ग्रन्थ आ ब्राह्मणपरिसमाप्तेः । | पाङ्क्तकर्मके फलभूत जिन तीन अन्नोंका ऊपर उल्लेख किया गया है वे कार्य तथा विस्तीर्ण विषयसे सम्बद्ध होनेके कारण पूर्वोक्त अन्नोंसे अलग और उनकी अपेक्षा उत्कृष्ट हैं। उनकी व्याख्याके लिये इस ब्राह्मणकी समाप्तिपर्यन्त आगेका ग्रन्थ है— |
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त्रीण्यात्मनेऽकुरुतेति मनो वाचं प्राणं तान्यात्मनेऽकुरुतान्यत्रमना अभूवं नादर्शमन्यत्रमना अभूवं नाश्रौषमिति मनसा ह्येव पश्यति मनसा शृणोति । कामः संकल्पो विचिकित्सा श्रद्धाऽश्रद्धा धृतिरधृतिर्ह्रीर्धीर्भीरित्येतत्सर्वं मन एव तस्मादपि पृष्ठत उपस्पृष्टो मनसा विजानाति यः कश्च शब्दो वागेव सा । एषा ह्यन्तमायत्तैषा हि न प्राणोऽपानो व्यान उदानः समानोऽन इत्येतत्सर्वं प्राण एवैतन्मयो वा अयमात्मा वाङ्मयो मनोमयः प्राणमयः ॥ ३ ॥
उसने तीन अन्न अपने लिये किये अर्थात् मन, वाणी और प्राण इन्हें उसने अपने लिये किया। 'मेरा मन अन्यत्र था, इसलिये मैंने नहीं देखा, मेरा मन अन्यत्र था, इसलिये मैंने नहीं सुना' [ ऐसा जो मनुष्य कहता है, इससे निश्चय होता है कि ] वह मनसे ही देखता है और मनसे ही सुनता है। काम, संकल्प, संशय, श्रद्धा, अश्रद्धा, धृति ( धारणशक्ति ), अधृति, लज्जा, बुद्धि, भय—ये सब मन ही हैं। इसीसे पीछेसे स्पर्श किये जानेपर मनुष्य मनसे जान लेता है। जो कुछ भी शब्द है, वह वाक् ही है;
ब्राह्मण ५ ] शाङ्करभाष्यार्थ ३४३
ब्राह्मण ५ ] शाङ्करभाष्यार्थ ३४३
क्योंकि यह अभिधेयके पर्यवसानमें अनुगत है, इसलिये प्रकाश्य नहीं है। प्राण, अपान, व्यान, उदान, समान और अन—ये सब प्राण ही हैं। यह आत्मा (शरीर) एतन्मय अर्थात् वाङ्मय, मनोमय और प्राणमय ही है ॥३॥
| [मनसोऽस्तित्व-निरूपणम्] | |
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| त्रीण्यात्मनेऽकुरुतेति कोऽस्यार्थ इत्युच्यते—मनोवाक्प्राणा एतानि त्रीण्यन्नानि, तानि मनो वाचं प्राणं चात्मने आत्मार्थमकुरुत—कृतवान् सृष्ट्वाऽऽदौ पिता। | ‘त्रीण्यात्मनेऽकुरुत’ इस मन्त्रका क्या अर्थ है, सो बतलाया जाता है—मन, वाक् और प्राण ये तीन अन्न हैं; उन मन, प्राण और वाक्को पिताने प्रथम उत्पन्न कर उन्हें अपने लिये नियत किया। |
| तेषां मनसोऽस्तित्वं स्वरूपं च प्रति संशय इत्यत आह—अस्ति तावन्मनः श्रोत्रादिबाह्यकरणव्यतिरिक्तम्, यत एवं प्रसिद्धम्--बाह्यकरणविषयात्मसम्बन्धे सत्यप्यभिमुखोभूतं विषयं न गृह्णाति, 'किं दृष्टवानसीदं रूपम् ?' इत्युक्तो वदति—'अन्यत्र मे गतं मन आसीत्सोऽहमन्यत्रमना आसं नादर्शम्'। तथा 'इदं श्रुतवानसि मदीयं वचः?' इत्युक्तः 'अन्यत्रमना अभूवं नाश्रौषं न श्रुतवानस्मि' इति। | उनमें मनके अस्तित्व और स्वरूपके विषयमें सन्देह है, इसलिये श्रुति कहती है—श्रोत्रादि बाह्य इन्द्रियोंसे भिन्न मन भी है; क्योंकि यह बात प्रसिद्ध है कि [कभी-कभी] पुरुष बाह्य इन्द्रिय, विषय और आत्माका सम्बन्ध रहते हुए भी अपने सामनेके विषयको ग्रहण नहीं करता, तथा यह पूछनेपर कि ‘क्या तूने यह रूप देखा है?’ कहता है—‘मेरा मन अन्यत्र चला गया था, अतः मैं अन्यत्रमना था, इसलिये नहीं देखा।’ तथा यह पूछनेपर कि ‘क्या तूने मेरा यह वचन सुना था?’ कहता है—‘मैं अन्यत्रमना था, इसलिये नहीं सुना।’ |
| तस्माद् यस्यासन्निधौ रूपादिग्रहणसमर्थस्यापि सतश्चक्षुरादेः | अतः जिसकी सन्निधि न होनेपर, रूपादिके ग्रहणमें समर्थ नेत्र आदिके |
३४४ | बृहदारण्यकोपनिषद् | [अध्याय १
३४४ | बृहदारण्यकोपनिषद् | [अध्याय १
| संस्कृत | हिन्दी |
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| स्वस्वविषयसम्बन्धे रूपशब्दादि-ज्ञानं न भवति, यस्य च भावे भवति, तदन्यदस्ति मनो नामा-न्तःकरणं सर्वकरणविषययोगि इत्यवगम्यते। तस्मात्सर्वो हि लोको मनसा ह्येव पश्यति मनसा शृणोति, तद्व्यग्रत्वे दर्शनाद्यभा-वात्। | होते हुए भी उन्हें अपने-अपने विषय-का सम्बन्ध होनेपर रूप एवं शब्दा-दिका ज्ञान नहीं होता और जिसके रहते हुए वह होता है, वह उन नेत्रादिसे भिन्न समस्त इन्द्रियोंके विषयोंसे सम्बन्ध रखनेवाला मन नामका अन्तःकरण है— ऐसा ज्ञात होता है। अतः सब लोग मनसे ही देखते हैं और मनसे ही सुनते हैं; क्योंकि उसके व्यग्र होनेपर दर्शनादि क्रिया नहीं होती। |
| मनःस्वरूप-निर्देशः<br>अस्तित्वे सिद्धे मनसः स्वरू-पार्थमिदमुच्यते— कामः स्त्रीव्यति-कराभिलाषादिः, संकल्पः प्रत्यु-पस्थितविषयविकल्पनं शुक्ल-नीलादिभेदेन, विचिकित्सा संशय-ज्ञानम्, श्रद्धा अदृष्टार्थेषु कर्म-स्वास्तिक्यबुद्धिर्देवतादिषु च, अश्रद्धा तद्विपरीता बुद्धिः, धृति-र्धारणं देहाद्यवसादे उत्तम्भनम्, अधृतिस्तद्विपर्ययः, ह्रीर्लज्जा, धीः प्रज्ञा, भीर्भयम्, इत्येतदेव-मादिकं सर्वं मन एव; मनसो ऽन्तःकरणस्य रूपाण्येतानि। | इस प्रकार मनका अस्तित्व सिद्ध हो जानेपर उसके स्वरूपके विषयमें यह कहा जाता है—काम-स्त्री-सम्बन्धकी अभिलाषादि, संकल्प-सम्मुखस्थ विषयकी शुक्ल-नीलादि भेदसे विशेष कल्पना करना, विचिकित्सा—संशयज्ञान, श्रद्धा—जिनका फल अदृष्ट है, उन कर्मों और देवतादिमें आस्तिकताका भाव रखना, अश्रद्धा—इससे विपरीत भाव रखना, धृति—धारण अर्थात् देहादिके शिथिल होनेपर उन्हें सँभाले रखना, अधृति—इसके विप-रीत होना, ह्री—लज्जा, धी—बुद्धि और भी—भय—इत्यादि प्रकारके ये सब भाव मन ही हैं; ये सब मन अर्थात् अन्तःकरणके रूप हैं। |
ब्राह्मण ५ ] शाङ्करभाष्यार्थ ३४५
ब्राह्मण ५ ] शाङ्करभाष्यार्थ ३४५
| [संस्कृत मूल/भाष्य] | [हिन्दी अनुवाद] |
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| (मनसोऽस्तित्वे लिङ्गान्तरनिर्देशः)<br><br>मनोऽस्तित्वं प्रत्यन्यच्च कारणमुच्यते—तस्मान्मनो नामास्त्यन्तःकरणम्, यस्माच्चक्षुषो ह्यगोचरे पृष्ठतोऽप्युपस्पृष्टः केनचिद् हस्तस्यायं स्पर्शो जानोरयमिति विवेकेन प्रतिपद्यते। यदि विवेककृन्मनो नाम नास्ति तर्हि त्वङ्मात्रेण कुतो विवेकप्रतिपत्तिः स्यात् ? यत्तद्विवेकप्रतिपत्तिकारणम्, तन्मनः। | मनके अस्तित्वके विषयमें एक दूसरा भी कारण बतलाया जाता है—इससे भी मननामक अन्तःकरणकी सत्ता है, क्योंकि नेत्रके सामने न आकर किसीके द्वारा पीठपर स्पर्श किये जानेपर मनुष्य विवेकद्वारा यह जान लेता है कि 'यह स्पर्श हाथका है या जानुका है।' यदि विवेक करनेवाला मन नहीं है, तो त्वचामात्रसे ऐसा विवेकज्ञान कैसे हो सकता है ? जो उस विवेकज्ञानका कारण है, वही मन है। |
| अस्ति तावन्मनः, स्वरूपं च तस्याधिगतम्। त्रीण्यन्नानीह फलभूतानि कर्मणां मनोवाक्प्राणाख्यान्यध्यात्ममधिभूतमधिदैवं च व्याचिख्यासितानि। तत्र आध्यात्मिकानां वाङ्मनःप्राणानां मनो व्याख्यातम्। अथेदानीं वाग्वक्तव्येत्यारम्भः— | अतः सारांश यह है कि मन है और उसका स्वरूप भी ज्ञात हो गया। यहाँ कर्मोंके फलभूत मन, वाक् और प्राणसंज्ञक अध्यात्म, अधिभूत और अधिदैव तीन अन्नोंकी व्याख्या करनी है। उनमेंसे आध्यात्मिक वाक्, मन और प्राणोंमेंसे मनकी व्याख्या तो कर दी गयी। अब वाक्का वर्णन करना है, इसलिये आरम्भ किया जाता है— |
| (वाङ्निरूपणम्)<br><br>यः कश्च लोके शब्दो ध्वनिस्ताल्वादिव्यङ्ग्यः प्राणिभिर्वर्णादिलक्षण इतरो वा वादित्रमेघादिनिमित्तः सर्वो ध्वनिर्वागेव सा। | लोकमें प्राणियोंद्वारा तालु आदिसे व्यक्त होनेवाला जितना भी वर्णादिरूप शब्द यानी ध्वनि है तथा बाजे या मेघादिके कारण होनेवाला और भी जो कोई शब्द है सब वाक् |
३४६ | बृहदारण्यकोपनिषद् | [ अध्याय १
| ३४६ | बृहदारण्यकोपनिषद् | [ अध्याय १ |
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| इदं तावद्वाचः स्वरूपमुक्तम् ।<br><br>अथ तस्याः कार्यमुच्यते—एषा वाग्घि यस्मादन्तमभिधेयावसानमभिधेयनिर्णयमायत्तानुगता ।<br><br>एषा पुनः स्वयं नाभिधेयवत्प्रकाश्या अभिधेयप्रकाशिकैव, प्रकाशात्मकत्वात् प्रदीपादिवत् । न हि प्रदीपादिप्रकाशः प्रकाशान्तरेण प्रकाश्यते, तद्वद्वाक्प्रकाशिकैव स्वयं न प्रकाश्येत्यनवस्थां श्रुतिः परिहरति—एषा हि न प्रकाश्या । प्रकाशकत्वमेव वाचः कार्यमित्यर्थः ।<br><br>अथ प्राण उच्यते—प्राणो मुखनासिकासञ्चार्या हृदयवृत्तिःप्रणयनात्प्राणः अपनयनान्मूत्रपुरीषादेरपानोऽधोवृत्तिरानाभिस्थानः; व्यानो व्यायमनकर्मा व्यानः<br><br>(पार्श्व-टिप्पणी : प्राणनिरूपणम्) | ही है। यह तो वाक्का स्वरूप बतलाया गया। अब उसका कार्य बतलाया जाता है—क्योंकि यह वाक् अन्त—अभिधेयावसान अर्थात् अभिधेय-निर्णयके आयत्त यानी अनुगत है; किंतु यह अभिधेयके समान स्वयं प्रकाश्य नहीं है, यह तो अभिधेयको प्रकाशित करनेवाली ही है; क्योंकि दीपकादिके समान यह प्रकाशस्वरूपा ही है। दीपकादिका प्रकाश किसी अन्य प्रकाशसे प्रकाशित नहीं होता। अतः उसके ही समान वाक् भी प्रकाशिका ही है, वह स्वयं किसीके द्वारा प्रकाश्य नहीं है—इस प्रकार श्रुति अनवस्था दोषकी निवृत्ति करती है, क्योंकि यह वाक् प्रकाश्य नहीं है। तात्पर्य यह है कि प्रकाशकत्व ही वाक्का कार्य है।<br><br>अब प्राणका वर्णन किया जाता है—प्राण-मुख और नासिकामें संचार करनेवाली जो [ वायुकी ] हृदयपर्यन्त वृत्ति है, वह प्रणयन (बहिर्गमन) के कारण प्राण कहलाती है, अपान-मल-मूत्रादिको नीचेकी ओर ले जानेके कारण वायुकी जो नाभिस्थानतक रहनेवाली अधोवृत्ति है, वह अपान है, व्यान—व्यायमन |
ब्राह्मण ५ ] शाङ्करभाष्यार्थ ३४७
ब्राह्मण ५ ] शाङ्करभाष्यार्थ ३४७
| प्राणापानयोः सन्धिवीर्यवत्कर्महेतुश्च; उदान उत्कर्षोर्ध्वगमनादिहेतुरापादतलमस्तकस्थान ऊर्ध्ववृत्तिः, समानः समं नयनाद् भुक्तस्य पीतस्य च कोष्ठस्थानोऽन्नपक्ता, अन इत्येषां वृत्तिविशेषाणां सामान्यभूता सामान्यदेहचेष्टाभिसम्बन्धिनी वृत्तिः; एवं यथोक्तं प्राणादिवृत्तिजातमेतत्सर्वं प्राण एव । | कर्मा व्यान है, यह प्राण और अपानकी सन्धि है तथा बलकी अपेक्षा रखनेवाले कर्मोंका कारण है, उदान—जो उत्कर्ष (पुष्टि) और ऊर्ध्वगमन (प्राणोत्क्रमण) आदिका हेतु है तथा जिसका पादतलसे लेकर मस्तकपर्यन्त स्थान एवं ऊपरकी ओर गति है वह उदान है, समान—खाये-पीये पदार्थोंका समीकरण करनेके कारण अन्नको पचानेवाला उदरस्थ वायु समान है, अन—यह इन विशेषवृत्तियोंकी सामान्यभूत तथा देहकी सामान्य चेष्टासे सम्बन्ध रखनेवाली वृत्ति है; इस प्रकार यह उपर्युक्त प्राणादि समस्त वृत्तिसमुदाय प्राण ही है। | | प्राण इति वृत्तिमानाध्यात्मिकोऽन उक्तः। कर्म चास्य वृत्तिभेदप्रदर्शनेनैव व्याख्यातम्। व्याख्यातान्याध्यात्मिकानि मनोवाक्प्राणाख्यान्यन्नानि। एतन्मय एतद्विकारः प्राजापत्यैरेतैर्वाङ्मनःप्राणैरारब्धः। कोऽसौ ? अयं कार्यकारणसङ्घात आत्मा पिण्ड आत्म- | 'प्राण' इस शब्दसे वृत्तिमान् आध्यात्मिक अन (वायु) कहा गया है। इसके कर्मकी व्याख्या तो इसके वृत्तिभेदके प्रदर्शनसे ही कर दी गयी। इस प्रकार मन, वाक् और प्राणसंज्ञक आध्यात्मिक अन्नोंकी व्याख्या की गयी। यह एतन्मय—इनका विकार अर्थात् इन प्राजापत्य वाक्, मन और प्राणोंसे आरब्ध है। यह कौन ? यह जो भूत और इन्द्रियोंका संघात आत्मा यानी पिण्ड है, |
३४८ | बृहदारण्यकोपनिषद् | [अध्याय १
| ३४८ | बृहदारण्यकोपनिषद् | [अध्याय १ |
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| स्वरूपत्वेनाभिमतोऽविवेकिभिः। अविशेषेणैतन्मय इत्युक्तस्य विशेषेण वाङ्मयो मनोमयः प्राणमय इति स्फुटीकरणम् ॥ ३ ॥ | जो अविवेकियोंद्वारा आत्मस्वरूपसे माना गया है । सामान्यरूपसे 'एतन्मयः' इस प्रकार कहे हुएको ही 'वाङ्मय, मनोमय एवं प्राणमय' ऐसा कहकर स्पष्ट किया गया है ॥ ३ ॥ |
आत्मार्थ अन्नोंका आधिभौतिक विस्तार
| तेषामेव प्राजापत्यानामन्नानामाधिभौतिको विस्तारोऽभिधीयते- | उन्हीं प्राजापत्य अन्नोंका आधिभौतिक विस्तार कहा जाता है— |
त्रयो लोका एत एव वागेवायं लोको मनोऽन्तरिक्षलोकः प्राणोऽसौ लोकः ॥ ४ ॥
तीनों लोक ये ही हैं । वाक् ही यह लोक है, मन अन्तरिक्षलोक है और प्राण वह ( स्वर्ग ) लोक है ॥ ४ ॥
| त्रयो लोका भूर्भुवः स्वरित्याख्या एत एव वाङ्मनःप्राणाः, तत्र विशेषो वागेवायं लोकः, मनोऽन्तरिक्षलोकः, प्राणोऽसौ लोकः । ४ । | 'भूः, भुवः और स्वः' नामक तीनों लोक ये वाक्, मन और प्राण ही हैं। उनका विशेषरूप इस प्रकार है—वाक् ही यह लोक है, मन अन्तरिक्षलोक है और प्राण वह ( स्वर्ग ) लोक है ॥ ४ ॥ | | तथा— | इसी प्रकार— |
त्रयो वेदा एत एव वागेवर्ग्वेदो मनो यजुर्वेदः प्राणः सामवेदः ॥ ५ ॥ देवाः पितरो मनुष्या एत एव वागेव देवा मनः पितरः प्राणो मनुष्याः ॥ ६ ॥ पिता माता प्रजैत एव मन एव पिता वाङ्माता प्राणः प्रजा ॥ ७ ॥