भारतकोश
बृहदारण्यकोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)

बृहदारण्यकोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)

Brihadaranyaka Upanishad with Shankara Bhashya

आदि शङ्कराचार्य द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished1,402 पृष्ठ

पृष्ठ 345, कुल 1402 में से

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पृष्ठ 345

ब्राह्मण ५ ] शाङ्करभाष्यार्थ ३३९


शाङ्करभाष्यम्भाष्यार्थ
च यतो जनयन्ति तान्यन्नानि। तदेतदभिधीयते पुरुषो वै योऽन्नानां भोक्ता सोऽक्षिति-रक्षयहेतुः।उत्पन्न करते हैं। इसीसे यह कहा जाता है कि पुरुष, जो अन्नोंका भोक्ता है, वह अक्षिति यानी उनके अक्षयका कारण है।
कथमस्याक्षितित्वम्? इत्युच्यते— स हि यस्मादिदं भुज्यमानं सप्तविधं कार्यकारणलक्षणं क्रियाफलात्मकं पुनः पुनर्भूयो भूयो जनयत उत्पादयति धिया धिया तत्तत्कालभाविन्या तया तया प्रज्ञया, कर्मभिश्च वाङ्मनःकायचेष्टितैः; यद्यदि ह यद्येतत्सप्तविधमन्नमुक्तं क्षणमात्रमपि न कुर्यात्प्रज्ञया कर्मभिश्च, ततो विच्छिद्येत भुज्यमानत्वात्सातत्येन क्षीयेत ह। तस्माद्यथैवायं पुरुषो भोक्ता अन्नानां नैरन्तर्येण, यथाप्रज्ञं यथाकर्म च करोत्यपि। तस्मात्पुरुषोऽक्षितिः सातत्येन कर्तृत्वात्। तस्माद् भुज्यमानान्यप्यन्नानि न क्षीयन्त इत्यर्थः।उसका अक्षितित्व किस प्रकार है? सो बतलाया जाता है—क्योंकि वह इस खाये जानेवाले कार्य-करण-रूप एवं कर्मफलात्मक सात प्रकारके अन्नको पुनः-पुनः—बार-बार 'धिया धिया'—तत्तत् कालमें होनेवाली तत्तद्बुद्धिसे और कर्मों यानी वाक्, मन और शरीरकी चेष्टाओंसे उत्पन्न कर देता है। यदि वह इस उपर्युक्त सप्तविध अन्नको विज्ञान और कर्मोंके द्वारा एक क्षण भी उत्पन्न न करे, तो निरन्तर खाये जानेके कारण वह विच्छिन्न यानी क्षीण हो जाय। अतः जिस प्रकार वह पुरुष अन्नोंका निरन्तर भोक्ता है, उसी प्रकार अपनी बुद्धि और कर्मके अनुसार उन्हें उत्पन्न भी करता है। अतः निरन्तर कर्त्ता होनेके कारण पुरुष अक्षिति है। इसीसे निरन्तर खाये जानेपर भी वे अन्न क्षीण नहीं होते—ऐसा इसका तात्पर्य है।
अतः प्रज्ञाक्रियालक्षणप्रबन्धारूढः सर्वो लोकः साध्यसाधन-अतः प्रज्ञा और क्रियासे लक्षित परम्परापर आरूढ़ हो साध्य तथा साधनरूपसे वर्तमान एवं कर्मका