बृहदारण्यकोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)

बृहदारण्यकोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)
Brihadaranyaka Upanishad with Shankara Bhashya
आदि शङ्कराचार्य द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)
DevanagariSanskritpublished1,402 पृष्ठ
पृष्ठ 344, कुल 1402 में से
संदर्भ में पढ़ेंपृष्ठ 344
| ३३८ | बृहदारण्यकोपनिषद् | [ अध्याय १ |
|---|
| संस्कृत-भाष्यम् | हिन्दी-अनुवाद |
|---|---|
| स्वाराज्यमाधिपत्यं पर्येत्" इति। | श्रेष्ठत्व, स्वराज्य और आधिपत्य प्राप्त किया।" |
| अन्नानामक्षय-त्वोपपादनम्<br><br>कस्मात्तानि न क्षीयन्तेऽद्यमानानि सर्वदेति। यदा पित्रा अन्नानि सृष्ट्वा सप्त पृथक्पृथग्भोक्तृभ्यः प्रदत्तानि, तदाप्रभृत्यैव तैर्भोक्तृभिरद्यमानानि—तन्निमित्तत्वात्तेषां स्थितेः—सर्वदा नैरन्तर्येण; कृतक्षयोपपत्तेश्च युक्तस्तेषां क्षयः। न च तानि क्षीयमाणानि, जगतोऽविभ्रष्टरूपेणैवावस्थानदर्शनात्। भवितव्यं चाक्षयकारणेन; तस्मात्कस्मात्पुनस्तानि न क्षीयन्त इति प्रश्नः। | अब 'कस्मात्तानि न क्षीयन्तेऽद्यमानानि सर्वदा' इस श्रुतिका अर्थ किया जाता है। जब पिताके द्वारा रचे जाकर सात अन्न अलग-अलग भोक्ताओंको बाँटे गये थे, तभीसे वे सर्वदा—निरन्तर उन भोक्ताओंद्वारा खाये जा रहे हैं; क्योंकि उन अन्नोंके कारण ही उनकी स्थिति है। कृतक वस्तुका क्षय होना उचित ही है, अतः उनका भी क्षय होना युक्तियुक्त ही है। किंतु वे क्षय होते नहीं जान पड़ते, क्योंकि संसार अक्षयरूपसे ही स्थित दिखायी देता है। उनके इस अक्षयका कोई कारण होना चाहिये; अतः यह प्रश्न होता है कि वे क्षीण क्यों नहीं होते ? |
| तस्येदं प्रतिवचनम्—'पुरुषो वा अक्षितिः'। यथासौ पूर्वमन्नानां स्रष्टासीत्पिता मेधया जायादिसम्बन्धेन च पाङ्क्तकर्मणा भोक्ता च, तथा येभ्यो दत्तान्यन्नानि तेऽपि तेषामन्नानां भोक्तारोऽपि सन्तः पितर एव, मेधया तपसा | इसका उत्तर यह है—'पुरुषो वा अक्षितिः'। जिस प्रकार पहले यह पिता विज्ञान और स्त्री आदिके सम्बन्धसे होनेवाले पाङ्क्तकर्मद्वारा अन्नोंका रचयिता और भोक्ता था, उसी प्रकार जिन्हें वे अन्न दिये गये हैं वे भी उन अन्नोंके भोक्ता होते हुए भी उनके पिता ही हैं; क्योंकि वे भी विज्ञान और कर्मके द्वारा उन अन्नोंको |