भारतकोश
बृहदारण्यकोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)

बृहदारण्यकोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)

Brihadaranyaka Upanishad with Shankara Bhashya

आदि शङ्कराचार्य द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished1,402 पृष्ठ

पृष्ठ 343, कुल 1402 में से

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पृष्ठ 343

ब्राह्मण ५ ] शाङ्करभाष्यार्थ ३३७


सकृन्मृत्वाविद्वाञ्शरीरेण वियुज्य सर्वात्मा भवति न पुनर्मरणाय परिच्छिन्नं शरीरं गृह्णातीत्यर्थः ।जीत लेता है। अर्थात् वह विद्वान् एक बार मरकर—शरीरसे विलग होकर सर्वात्मा हो जाता है, पुनः मरनेके लिये परिच्छिन्न शरीर ग्रहण नहीं करता।
कः पुनर्हेतुः सर्वात्माप्त्या मृत्युमपजयति? इत्युच्यते—सर्वं समस्तं हि यस्माद्देवेभ्यः सर्वेभ्योऽन्नाद्यमन्नमेव तदाद्यं च सायंप्रातराहुतिप्रक्षेपेण प्रयच्छति। तद्युक्तं सर्वमाहुतिमयमात्मानं कृत्वा सर्वदेवान्नरूपेण सर्वैर्देवैरेकात्मभावं गत्वा सर्वदेवमयो भूत्वा पुनर्न म्रियत इति ।किंतु वह सर्वात्मप्राप्तिके द्वारा जो मृत्युको जीत लेता है, इसका क्या कारण है? यह बतलाया जाता है—क्योंकि वह सायंकाल और प्रातःकालके आहुतिदानके द्वारा समस्त देवताओंको सम्पूर्ण अन्नाद्य—जो अन्न और आद्य (भक्ष्य) भी है—देता है। अतः अपनेको सर्वाहुतिमय करके समस्त देवताओंके अन्नरूपसे समस्त देवताओंके साथ एकत्वको प्राप्त होकर वह सर्वदेवमय होकर पुनः नहीं मरता—ऐसा कथन उचित हो है।
अथैतदप्युक्तं ब्राह्मणेन—ब्राह्मणने एक बात यह भी कही है—
“ब्रह्म वै स्वयम्भु तपोऽतप्यत, तदैक्षत न वै तपस्यानन्त्यमस्ति, हन्ताहं भूतेष्वात्मानं जुह्वानि भूतानि चात्मनीति, तत्सर्वेषु भूतेष्वात्मानं हुत्वा भूतानि चात्मनि सर्वेषां भूतानां श्रेष्ठ्यं"स्वयम्भू ब्रह्म (हिरण्यगर्भ) ने तप (कर्म) किया। उसने विचार किया निश्चय ही इस तपमें अनन्तत्व (अमृतत्व) नहीं है। अच्छा तो मैं अपनेको भूतोंमें हवन करूँ और भूतोंको अपनेमें। अतः उसने समस्त भूतोंमें अपनेको और समस्त भूतोंको अपनेमें हवन कर समस्त भूतोंका

बृ० उ० २२—