भारतकोश
बृहदारण्यकोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)

बृहदारण्यकोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)

Brihadaranyaka Upanishad with Shankara Bhashya

आदि शङ्कराचार्य द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished1,402 पृष्ठ

पृष्ठ 493, कुल 1402 में से

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पृष्ठ 493

ब्राह्मण १ ] शाङ्करभाष्यार्थ ४८७


प्रामाण्यशङ्का तावन्नास्ति ।अप्रामाण्यकी शङ्का तो हो नहीं सकती ।
यच्चोक्तं स्वार्थविघातकरत्वा- <br> दप्रामाण्यमिति, तदपि न, तदर्थ- <br> प्रतिपत्तेर्बाधकाभावात् । न हि <br> उपनिषद्भ्यः—ब्रह्मैकमेवाद्विती- <br> यम्, नैव च—इति प्रतिपत्तिरस्ति; <br> यथाग्निरुष्णः शीतश्चेत्यस्माद्वा- <br> क्याद्विरुद्धार्थद्वयप्रतिपत्तिः । अ- <br> भ्युपगम्य चैतदवोचाम; न तु <br> वाक्यप्रामाण्यसमय एष न्यायः— <br> यदुतैकस्य वाक्यस्यानेकार्थत्वम्। <br> सति चानेकार्थत्वे, स्वार्थश्च स्यात्, <br> तद्विघातकृच्च विरुद्धोऽन्योऽर्थः। न <br> त्वेतत्—वाक्यप्रमाणकानां विरु- <br> द्धमविरुद्धं च' एकं वाक्यम्, अने- <br> कमर्थं प्रतिपादयतीत्येष समयः, <br> अर्थैकत्वाद्वह्येकवाक्यता ।और ऐसा जो कहा कि अपने अर्थका विघात करनेवाली होनेसे उनकी अप्रामाणिकता है, सो ऐसी बात भी नहीं है, क्योंकि उनसे होनेवाले अर्थज्ञानका कोई बाधक नहीं है । उपनिषदोंसे यह ज्ञान नहीं होता कि ब्रह्म एकमात्र अद्वितीय है भी और नहीं भी है, जिस प्रकार कि 'अग्नि उष्ण और शीतल भी होता है, इस एक ही वाक्यसे दो विरुद्ध अर्थोंका ज्ञान होता है । तथा यह समझकर ही हम ऐसा कह चुके हैं कि वाक्यकी प्रामाणिकताके समय एक वाक्यके अनेक अर्थ मानने उचित नहीं हैं । यदि वाक्यके अनेक अर्थ होंगे तो एक उसका अपना अर्थ होगा और दूसरा उसका विघात करनेवाला अर्थ होगा । 'एक ही वाक्य बहुत-से विरुद्ध और अविरुद्ध अर्थोंका भी प्रतिपादन करता है, यह वाक्यको प्रमाण माननेवालोंका सिद्धान्त नहीं है; क्योंकि अर्थकी एकता होनेसे ही सबकी एकवाक्यता होती है ।
न च कानिचिदुपनिषद्वाक्यानि <br> ब्रह्मैकत्वप्रतिषेधं कुर्वन्ति । यत्तु, <br> लौकिकं वाक्यम्—अग्निरुष्णःकोई-कोई उपनिषद्वाक्य ब्रह्मकी एकताका प्रतिषेध करते हों—ऐसी भी बात नहीं है । 'अग्नि उष्ण और शीतल भी होता है, यह जो लौकिक