बृहदारण्यकोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)
Brihadaranyaka Upanishad with Shankara Bhashya
आदि शङ्कराचार्य द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)
पृष्ठ 492, कुल 1402 में से
संदर्भ में पढ़ें| ४८६ | बृहदारण्यकोपनिषद् | [ अध्याय २ |
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| न करोत्येवाग्निर्वा रूपप्रकाशम् ? | नहीं करता है तथा अग्नि रूपको क्या प्रकाशित नहीं करता है ? | | अथ करोति । | पूर्व०— करता तो है । | | यदि करोति भवतु तदा प्रतिषेधार्थं प्रमाणं भवद्वाक्यम्, अग्निश्च रूपप्रकाशको भवेत्; प्रतिषेधवाक्यप्रामाण्ये भवत्येवोपनिषदां प्रामाण्यम् । अत्र भवन्तो ब्रुवन्तु कः परिहार इति ? | सिद्धान्ती— यदि वह उसका प्रतिषेध करता है तो उसका प्रतिषेध करनेमें आपका वाक्य प्रमाण हो सकता है तथा अग्नि भी रूपका प्रकाशक हो सकता है । अतः यदि आपका प्रतिषेधक वाक्य प्रामाणिक है तो उपनिषदोंकी प्रामाणिकता होनी ही चाहिये । अब आप बतलाइये इसका क्या परिहार हो सकता है ? | | नन्वत्र प्रत्यक्षा मद्वाक्य उपनिषत्प्रामाण्यप्रतिषेधार्थप्रतिपत्तिरग्नौ च रूपप्रकाशनप्रतिपत्तिः प्रमा । | पूर्व०— यहाँ मेरे वाक्यमें उपनिषत्प्रामाण्यके प्रतिषेधका ज्ञानरूप प्रमा तथा अग्निमें रूपप्रकाशनका ज्ञानरूप प्रमा तो प्रत्यक्ष ही है । | | कस्तर्हि भवतः प्रद्वेषो ब्रह्मैकत्वप्रत्यये प्रमां प्रत्यक्षां कुर्वतीषूपनिषत्सूपलभ्यमानासु ? प्रतिषेधानुपपत्तेः । शोकमोहादिनिवृत्तिश्च प्रत्यक्षं फलं ब्रह्मैकत्वप्रतिपत्तिपारम्पर्यजनितमित्यवोचाम। तस्मादुक्तोत्तरत्वादुपनिषदं प्रत्य- | सिद्धान्ती— तो फिर ब्रह्मैकत्वज्ञानमें प्रमाको प्रत्यक्ष करती हुई उपलब्ध होनेवाली उपनिषदोंमें ही आपका क्या द्वेष है ? क्योंकि उनके प्रामाण्यका प्रतिषेध नहीं किया जा सकता । तथा हम यह कह चुके हैं कि शोकमोहादिकी निवृत्ति—यह ब्रह्मैकत्वज्ञानकी परम्परासे होनेवाला प्रत्यक्ष फल है । अतः इसका उत्तर ऊपर दे दिया जानेके कारण उपनिषदोंमें |
१. 'उपनिषदें ब्रह्मज्ञानरूप प्रमा उत्पन्न करती हैं, यह उत्तर ऊपर दिया गया है ।