बृहदारण्यकोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)

बृहदारण्यकोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)
Brihadaranyaka Upanishad with Shankara Bhashya
आदि शङ्कराचार्य द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)
DevanagariSanskritpublished1,402 पृष्ठ
पृष्ठ 494, कुल 1402 में से
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| ४८८ | बृहदारण्यकोपनिषद् | [ अध्याय २ |
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| संस्कृत | हिन्दी अनुवाद |
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| शीतश्चेति, न तत्रैकवाक्यता, तदेकदेशस्य प्रमाणान्तरविषयानुवादित्वात्। अग्निः शीत इत्येतदेकं वाक्यम्; अग्निरुष्ण इति तु प्रमाणान्तरानुभवस्मारकम्, न तु स्वयमर्थावबोधकम्। अतो नाग्निः शीत इत्यनेनैकवाक्यता, प्रमाणान्तरानुभवस्मारेणैवोपक्षीणत्वात्। यत्तु विरुद्धार्थप्रतिपादकमिदं वाक्यमिति मन्यते, तच्छीतोष्णपदाभ्याम् अग्निपदसामानाधिकरण्यप्रयोगनिमित्ता भ्रान्तिः; न त्वेवैकस्य वाक्यस्यानेकार्थत्वं लौकिकस्य वैदिकस्य वा। | वाक्य है, वहाँ एकवाक्यता नहीं होती; क्योंकि उसका एकदेश प्रमाणान्तरके विषयभूत अर्थका अनुवाद करनेवाला है। 'अग्नि शीतल होता है' यह एक वाक्य है और 'अग्नि उष्ण होता है' यह प्रमाणान्तरसे प्राप्त हुए अनुभवका अनुवादक है, स्वयं किसी विशेष अर्थका द्योतक नहीं है। अतः 'अग्नि शीतल होता है' इस वाक्यसे उसकी एकवाक्यता नहीं है; क्योंकि वह प्रमाणान्तरसे होनेवाले अनुभवकी स्मृति कराकर ही समाप्त हो जाता है। और ऐसा जो माना जाता है कि यह वाक्य विरुद्ध अर्थोंका प्रतिपादन करनेवाला है, वह शीत और उष्ण पदोंका अग्निपदके समानाधिकरणरूपसे प्रयोग होनेके कारण उत्पन्न हुई भ्रान्ति¹ है। वास्तवमें तो लौकिक हो अथवा वैदिक, एक वाक्यके अनेक अर्थ हो ही नहीं सकते। |
| [कर्मकाण्डप्रामाण्योपपादनम्]<br>यच्चोक्तं कर्मकाण्डप्रामाण्यविघातकृदुपनिषद्व्राक्यमिति, तन्न; अन्यार्थत्वात्। ब्रह्मैकत्वप्रतिपादनपरा ह्युपनिषदो नेष्टार्थप्राप्तौ | और ऐसा जो कहा कि उपनिषद्वाक्य कर्मकाण्डकी प्रामाणिकताको नष्ट करनेवाले हैं, सो यह बात नहीं है; क्योंकि उनका तात्पर्य तो दूसरा है। ब्रह्मकी एकताका प्रतिपादन करनेवाली उपनिषदें अभीष्ट अर्थकी |
१. तात्पर्य यह है कि वस्तुतः यह किसी प्रमाका उत्पादक नहीं है।