बृहदारण्यकोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)
Brihadaranyaka Upanishad with Shankara Bhashya
आदि शङ्कराचार्य द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)
पृष्ठ 495, कुल 1402 में से
संदर्भ में पढ़ें| ब्राह्मण १ ] | शाङ्करभाष्यार्थ | ४८९ |
|---|
| साधनोपदेशं तस्मिन्वा पुरुषनियोगं वारयन्ति, अनेकार्थत्वानुपपत्तेरेव । | प्राप्तिके लिये साधनके उपदेश तथा उसमें पुरुषके नियोगका निवारण नहीं करतीं; क्योंकि उनके अनेक अर्थ होने सम्भव ही नहीं हैं। | | न च कर्मकाण्डवाक्यानां स्वार्थे प्रमा नोत्पद्यते । असाधारणे चेत्स्वार्थे प्रमामुत्पादयति वाक्यम्, कुतोऽन्येन विरोधः स्यात् ? | तथा कर्मकाण्डसम्बन्धी वाक्योंकी स्वार्थमें प्रमा उत्पन्न न होती हो—ऐसी बात भी नहीं है ! यदि कोई वाक्य अपने असाधारण अर्थमें प्रमा उत्पन्न करता है तो उसका दूसरे वाक्यसे विरोध क्यों होगा ? | | ब्रह्मैकत्वे निर्विषयत्वात्प्रमा नोत्पद्यत एवेति चेत् ? | पूर्व०—यदि कहें ब्रह्मकी एकता माननेपर तो कर्मकाण्डपरक वाक्योंका कोई विषय ही नहीं रहता, इसलिये प्रमा उत्पन्न हो ही नहीं सकती; तो ? | | न, प्रत्यक्षत्वात्प्रमायाः । "दर्शपूर्णमासाभ्यां स्वर्गकामो यजेत" "ब्राह्मणो न हन्तव्यः" इत्येवमादिवाक्येभ्यः प्रत्यक्षा प्रमा जायमाना; 'सा नैव भविष्यति, यद्युपनिषदो ब्रह्मैकत्वं बोधयिष्यन्ति' इत्यनुमानम्; न चानुमानं प्रत्यक्षविरोधे प्रामाण्यं लभते; तस्मादसदेवैतद्ब्रूयते—प्रमैव नोत्पद्यत इति। अपि च यथाप्राप्तस्यैव | सिद्धान्ती —ऐसी बात नहीं है, क्योंकि उनसे प्रमाका होना तो प्रत्यक्ष है। "स्वर्गकी इच्छावाला दर्श और पूर्णमास यज्ञोंद्वारा यजन करे" "ब्राह्मणका वध नहीं करना चाहिये" इत्यादि ऐसे ही वाक्योंसे प्रमा प्रत्यक्ष उत्पन्न होती देखी जाती है; 'यदि उपनिषदें ब्रह्मकी एकताका ज्ञान करायेंगी तो वह नहीं होगी' यह तो अनुमान है। और प्रत्यक्षसे विरोध होनेपर अनुमानकी प्रामाणिकता नहीं रह सकती। इसलिये यह कहना कि उनसे प्रमा ही उत्पन्न नहीं होती—असत् ही है। अपितु जो पुरुष |