बृहदारण्यकोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)
Brihadaranyaka Upanishad with Shankara Bhashya
आदि शङ्कराचार्य द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)
पृष्ठ 480, कुल 1402 में से
संदर्भ में पढ़ें| ४७४ | बृहदारण्यकोपनिषद् | [ अध्याय २ |
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| न, श्रुतेर्ज्ञापकत्वात्; न शास्त्रं पदार्थानन्यथा कर्तुं प्रवृत्तम्। किं तर्हि ? यथाभूतानामज्ञातानां ज्ञापने। | सिद्धान्ती-ऐसी बात नहीं है; क्योंकि श्रुति तो केवल ज्ञान ही करानेवाली है। शास्त्रकी प्रवृत्ति पदार्थोंको अन्यथा करनेके लिये नहीं है। तो फिर किस लिये है ? यथाभूत अज्ञात पदार्थोंको ज्ञात करानेके लिये। | | किञ्चातः ! | पूर्व०-इससे क्या होता है ? | | शृणु—अतो यद्भवति, यथाभूता मूर्तामूर्तादिपदार्थधर्मा लोके प्रसिद्धाः। तद्दृष्टान्तोपादानेन तदविरोध्येव वस्त्वन्तरं ज्ञापयितुं प्रवृत्तं शास्त्रं न लौकिकवस्तुविरोधज्ञापनाय लौकिकमेव दृष्टान्तमुपादत्ते। उपादीयमानोऽपि दृष्टान्तोऽनर्थकः स्याद्दाष्टन्तिकासङ्गतेः। न ह्यग्निः शीत आदित्यो न तपतीति वा दृष्टान्तशतेनापि प्रतिपादयितुं शक्यम्, प्रमाणान्तरेणान्यथाधिगतत्वाद्वस्तुनः। न च प्रमाणं प्रमाणान्तरेण विरुध्यते, प्रमाणान्तराविषयमेव हि प्रमाणा- | सिद्धान्ती-इससे जो होता है, सो सुनो। लोकमें वास्तविक ही मूर्त और अमूर्तादिरूप पदार्थ-धर्म प्रसिद्ध हैं। उन्हें दृष्टान्तरूपसे ग्रहण कर शास्त्र उनसे अविरोधी एक अन्य वस्तुको बतलानेके लिये प्रवृत्त होता है। वह लौकिक वस्तुओंका विरोध सूचित करनेके लिये लौकिक दृष्टान्तोंको ही ग्रहण करता हो-ऐसी बात नहीं है। ऐसा दृष्टान्त तो दाष्टन्तिकसे असंगत होनेके कारण ग्रहण किये जानेपर भी व्यर्थ ही होगा। अग्नि शीतल होता है, अथवा सूर्य नहीं तपता-यह बात, सैकड़ों दृष्टान्तोंसे भी प्रतिपादित नहीं हो सकती; क्योंकि अन्य प्रमाणसे तो वह वस्तु दूसरे प्रकारकी जानी जाती है। एक प्रमाणका दूसरे प्रमाणसे विरोध नहीं होता। जो वस्तु एक प्रमाणसे नहीं जानी जाती उसीको |