बृहदारण्यकोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)

बृहदारण्यकोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)
Brihadaranyaka Upanishad with Shankara Bhashya
आदि शङ्कराचार्य द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)
DevanagariSanskritpublished1,402 पृष्ठ
पृष्ठ 479, कुल 1402 में से
संदर्भ में पढ़ेंपृष्ठ 479
ब्राह्मण १] शाङ्करभाष्यार्थ ४७३
| संस्कृत मूल | हिन्दी भाष्यार्थ |
|---|---|
| श्रुतिस्मृतिन्यायविरुद्धा एते सर्वे पक्षाः। | इत्यादि श्रुति, स्मृति और युक्तियोंसे विरुद्ध हैं। |
| अचलस्य परमात्मन एकदेशपक्षे विज्ञानात्मनः कर्मफलवद्देशसंसरणानुपपत्तिः, परस्य वा संसारित्वम्—इत्युक्तम्। परस्यैकदेशोऽग्निविस्फुलिङ्गवत्स्फुटितो विज्ञानात्मा संसरतीति चेत् — तथापि परस्यावयवस्फुटनेन क्षतप्राप्तिः, तत्संसरणे च परमात्मनः प्रदेशान्तरावयव्यूहे छिद्रताप्राप्तिः; अव्रणत्ववाक्यविरोधश्च । आत्मावयवभूतस्य विज्ञानात्मनः संसरणे परमात्मशून्यप्रदेशाभावादवयवान्तरनोदनव्यूहनाभ्यां हृदयशूलेनेव परमात्मनो दुःखित्वप्राप्तिः । | अचल परमात्माके एक देशमें विज्ञानात्मा है—इस पक्षमें विज्ञानात्माका कर्मफलयुक्त देशमें जाना सम्भव नहीं है तथा परमात्माको संसारित्वकी प्राप्ति होती है—ऐसा ऊपर कहा जा चुका है। यदि कहो कि अग्निसे चिनगारीके समान परमात्माका एक देशरूप विज्ञानात्मा उससे अलग होकर आता-जाता है तो भी अवयवके फूटकर अलग हो जानेसे परमात्मामें क्षतकी प्राप्ति होगी तथा उसके जानेपर परमात्माके अन्य देशस्थ अवयवसमुदायमें छेदकी भी प्राप्ति होगी और इस प्रकार परमात्माकी निश्छिद्रताका प्रतिपादन करनेवाले वाक्यसे विरोध होगा। परमात्मासे शून्य देशका अभाव होनेके कारण आत्माके अवयवभूत विज्ञानात्माको संसारित्वकी प्राप्ति होनेपर अवयवान्तरके ह्रास और वृद्धिके कारण परमात्माको हृदयशूलके समान दुःखकी प्राप्ति होगी। |
| अग्निविस्फुलिङ्गादिदृष्टान्तश्रुतेर्न दोष इति चेत् ? | पूर्व०—किंतु आगकी चिनगारी आदि दृष्टान्तोंका वर्णन करनेवाली श्रुति होनेके कारण ऐसा माननेमें भी कोई दोष नहीं हो सकता—यदि ऐसा कहें तो ? |