भारतकोश
बृहदारण्यकोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)

बृहदारण्यकोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)

Brihadaranyaka Upanishad with Shankara Bhashya

आदि शङ्कराचार्य द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished1,402 पृष्ठ

पृष्ठ 470, कुल 1402 में से

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पृष्ठ 470
४६४बृहदारण्यकोपनिषद्[ अध्याय २

| न्तरेष्वपि तद्धर्मक एव भवति । स चेत्तद्धर्मकत्वं व्यभिचरति, सर्वः प्रमाणव्यवहारो लुप्येत । तथा च न्यायविदः साङ्ख्यमीमांसकादयोऽसंसारिणोऽभावं युक्तिशतैः प्रतिपादयन्ति । | उन्हीं धर्मोंवाला रहता है। यदि वह उन धर्मोंका त्याग कर दे तो सारे ही प्रमाण-व्यवहारका लोप हो जाय। इसी प्रकार सांख्यवादी और मीमांसकादि न्यायवेत्ता भी सैकड़ों युक्तियोंसे असंसारी ईश्वरके अभावका प्रतिपादन करते हैं। | | संसारिणोऽपि जगदुत्पत्तिस्थितिलयक्रियाकर्तृत्वविज्ञानस्याभावाद् अयुक्तमिति चेत्—यन्महता प्रपञ्चेन स्थापितं भवता, शब्दादिसुक्संसार्येवावस्थान्तरविशिष्टो जगत इह कर्तेति—तदसत्; यतो जगदुत्पत्तिस्थितिलयक्रियाकर्तृत्वविज्ञानशक्तिसाधनाभावः सर्वलोकप्रत्यक्षः संसारिणः । सकथमस्मदादिः संसारी मनसापि चिन्तयितुमशक्यं पृथिव्यादिविन्यासविशिष्टं जगन्निर्मिनुयात् ? अतोऽयुक्तमिति चेन्न, शास्त्रात्; शास्त्रं | यदि कहो कि जगत्की उत्पत्ति, स्थिति और लयरूप क्रियाके कर्तृत्वका ज्ञान न होनेके कारण संसारी जीवको भी जगत्का कर्ता मानना उचित नहीं है, अर्थात् तुमने जो बड़े विस्तारसे यहाँ यह सिद्ध किया है कि शब्दादिका भोक्ता अवस्थान्तरविशिष्ट संसारी जीव ही जगत्का कर्ता है, वह ठीक नहीं है; क्योंकि संसारी जीवमें जगत्को उत्पत्ति, स्थिति एवं लयरूप क्रियाके कर्तृत्वविज्ञानकी शक्तिके साधनोंका अभाव सभी लोकोंको प्रत्यक्ष है। वह हम-जैसा संसारी जीव इस पृथिवी आदिके यथास्थान स्थापनपूर्वक विभिन्न प्रकारकी रचनासे विशिष्ट एवं मनसे भी अचिन्तनीय जगत्‌की किस प्रकार रचना कर सकता है ? इसलिये ऐसा मानना उचित नहीं; ऐसी यदि कोई शङ्का करे तो ठीक नहीं, क्योंकि शास्त्रसे |