बृहदारण्यकोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)

बृहदारण्यकोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)
Brihadaranyaka Upanishad with Shankara Bhashya
आदि शङ्कराचार्य द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)
DevanagariSanskritpublished1,402 पृष्ठ
पृष्ठ 471, कुल 1402 में से
संदर्भ में पढ़ेंपृष्ठ 471
ब्राह्मण १] शाङ्करभाष्यार्थ ४६५
| मूल संस्कृत | भाषानुवाद |
|---|---|
| संसारिणः “एवमेवास्मादात्मनः” (२।१।२०) इति जगदुत्पत्त्यादि दर्शयति। तस्मात्सर्वं श्रद्धेयमिति स्यादयमेकः पक्षः। | यही सिद्ध होता है। “इसी प्रकार इस आत्मासे” इत्यादि शास्त्र संसारीसे ही जगत्की उत्पत्ति आदि प्रदर्शित करता है; इसलिये इस सबमें विश्वास रखना चाहिये—ऐसा यह एक पक्ष हो सकता है। १ |
| [असंसारिणो जगत्कारणत्वोपपादनम्] <br> “यः सर्वज्ञः सर्ववित्” (मु० उ० १।१।९) “योऽशनायापिपासे······अत्येति” (बृ० उ० ३।५।१) “असङ्गो न हि सज्यते” (३।९।२६) “एतस्य वा अक्षरस्य प्रशासने” (३।८।९) “यः सर्वेषु भूतेषु तिष्ठन् ····अन्तर्याम्यमृतः” (३।७।१५) “स यस्तान्पुरुषान्निरुह्य···अत्यक्रामत्” (३।९।२६) “स वा एष महानज आत्मा” (४।४।२२) “एष सेतुर्विधरणः” (४।४।२२) “सर्वस्य वशी सर्वस्येशानः” (४।४।२२) “य आत्मापहतपाप्मा विजरो विमृत्युः” (छा० उ० ८।७।१) “तत्तेजोऽसृजत” (छा० उ० ६।२।३) “आत्मा वा इदमेक एवाग्र आसीत्” (ऐ० उ० १।१।१) “न लिप्यते लोक- | “जो सर्वज्ञ और सर्ववेत्ता है”, “जो क्षुधा-पिपासासे अतीत है”, “जो असङ्ग है इसलिये किसीसे संयुक्त नहीं होता”, “इस अक्षरके ही शासनमें”, “जो समस्त भूतोंमें रहनेवाला, अन्तर्यामी और अमृत है”, “जो उन पुरुषोंका निरोध करके उनसे आगे बढ़ा हुआ है”, “वही यह महान् अजन्मा आत्मा है”, “यह विशेषरूपसे धारण करनेवाला सेतु है”, “यह सबको वशमें रखनेवाला और सबका शासक है”, “जो निष्पाप और अजर-अमर आत्मा है”, “उसने तेजको रचा”, “आरम्भमें यह एक आत्मा ही था”, “वह लोकदुःखसे लिप्त नहीं होता |
१. यहाँतक सिद्धान्तीने संसारी जीवको ही जगत्का कारण माननेवाले पूर्वपक्षको प्रदर्शित किया है। इससे आगे असंसारीका जगत्कारणत्व प्रदर्शित किया जाता है।
बृ० उ० ३०—