भारतकोश
बृहदारण्यकोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)

बृहदारण्यकोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)

Brihadaranyaka Upanishad with Shankara Bhashya

आदि शङ्कराचार्य द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished1,402 पृष्ठ

पृष्ठ 792, कुल 1402 में से

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पृष्ठ 792
७८२बृहदारण्यकोपनिषद्[अध्याय ३
अन्येऽक्षरस्य शक्तय एता इति वदन्ति, अनन्तशक्तिमदक्षरमिति च । अन्ये त्वक्षरस्य विकारा इति वदन्ति । अवस्थाशक्ती तावन्नोपपद्येते अक्षरस्य, अशनायादिसंसारधर्मातीतत्वश्रुतेः । न ह्यशनायाद्यतीतत्वमशनायादिधर्मवदवस्थावत्त्वं चैकस्य युगपदुपपद्यते; तथा शक्तिमत्त्वं च । विकारावयवत्वे च दोषाः प्रदर्शिताश्चतुर्थे । तस्मादेता असत्याः सर्वाः कल्पनाः ।<br><br>कस्तर्हि भेद एषाम् ? उपाधिकृत इति ब्रूमः; न स्वत एषां भेदोऽभेदो वा, सैन्धवघनवत् प्रज्ञानघनैकरसस्वाभाव्यात्, “अपूर्वमनपरमनन्तरमबाह्यम्” (बृ० उ० २।५।१९) “अयमात्मा ब्रह्म” (२।५।१९) इति च श्रुतेः । “सबाह्याभ्यन्तरो ह्यजः” (मु० उ० २।१।२) इतिइनसे भिन्न दूसरे लोग ऐसा कहते हैं कि ये अक्षरकी शक्तियां हैं; और उनका यह भी कथन है कि वह अक्षर अनन्त शक्तिमान् है। इनके सिवा दूसरे लोग यह कहते हैं कि ये अक्षरके विकार हैं। किंतु इनका अक्षरकी अवस्था या शक्ति होना तो सम्भव नहीं है, क्योंकि वह क्षुधादि संसारधर्मोंसे अतीत है—ऐसी श्रुति है। एक ही वस्तुका एक साथ क्षुधादि धर्मोंसे अतीत होना और क्षुधादि धर्मवाली अवस्थाओंसे युक्त होना सम्भव नहीं है; इसी प्रकार उसका शक्तिमान् होना भी असम्भव है। उसके विकार या अवयव माननेमें जो दोष हैं, वे चतुर्थ ब्राह्मणमें दिखाये जा चुके हैं। इसलिये ये सारी कल्पनाएँ असत्य हैं।<br><br>तो फिर इनका भेद क्या है ? हमारा कथन है कि इनका भेद उपाधिकृत है। स्वयं तो इनका भेद या अभेद कुछ भी नहीं है, क्योंकि ये सैन्धवघनके समान एकमात्र प्रज्ञानघनरसस्वरूप हैं। जैसा कि “वह कारणसे भिन्न, कार्यसे भिन्न अन्तररहित और अबाह्य है” “यह आत्मा ब्रह्म है” इत्यादि श्रुतिसे सिद्ध होता है तथा “वह बाहर-भीतरके सहित सर्वत्र विद्यमान एवं अजन्मा है” ऐसा आथर्वण