बृहदारण्यकोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)

बृहदारण्यकोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)
Brihadaranyaka Upanishad with Shankara Bhashya
आदि शङ्कराचार्य द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)
DevanagariSanskritpublished1,402 पृष्ठ
पृष्ठ 793, कुल 1402 में से
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| ब्राह्मण ८ ] | शाङ्करभाष्यार्थ | ७८३ |
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| संस्कृत-मूल (भाष्य) | हिन्दी-भाष्यार्थ |
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| चाथर्वणे । तस्मान्निरुपाधिकस्यात्मनो निरूपाख्यत्वान्निर्विशेषत्वादेकत्वाच्च “नेति नेति” ( बृ० उ० ३ । ९ । २६) इति व्यपदेशो भवति । | श्रुतिमें कहा है। अतः उपाधिशून्य आत्मा अनिर्वचनीय, निर्विशेष और एक होनेके कारण उसका “नेति नेति” इस प्रकार उपदेश किया जाता है । |
| अविद्याकामकर्मविशिष्टकार्यकरणोपाधिरात्मा संसारी जीव उच्यते । नित्यनिरतिशयज्ञानशक्त्युपाधिरात्मान्तर्यामीश्वर उच्यते, स एव निरुपाधिः केवलः शुद्धः स्वेन स्वभावेनाक्षरं पर उच्यते, तथा हिरण्यगर्भाव्याकृतदेवताजातिपिण्डमनुष्यतिर्यक्प्रेतादिकार्यकरणोपाधिभिर्विशिष्टस्तदाख्यस्तद्रूपो भवति । तथा “तदेजति तन्नैजति” (ईशा० उ० ५) इति व्याख्यातम् । तथा “एष त आत्मा” (बृ० उ० ३ । ७ । ३–२३) “एष सर्वभूतान्तरात्मा” (मु० उ० २ । १ । ४) “एष सर्वेषु भूतेषु गूढः” (क० उ० १ । ३ । १२) “तत्त्वमसि” (छा० उ० ६।८।१६) “अहमेवेदं सर्वम्” (छा० उ० ७ । २५ । १) “आत्मैवेदं सर्वम्” (छा० उ० ७ । २५ । २) “नान्योऽतोऽस्ति द्रष्टा” (बृ० उ० ३ । ७ । २३) इत्यादिश्रुतयो न विरुध्यन्ते। कल्पनान्तरेष्वेताः श्रुतयो न | अविद्या, काम और कर्मविशिष्ट देह एवं इन्द्रियरूप उपाधिवाला आत्मा संसारी जीव कहा जाता है । तथा नित्य निरतिशय ज्ञानशक्तिरूप उपाधिवाला आत्मा अन्तर्यामी ईश्वर कहा जाता है । वही उपाधिशून्य, केवल और शुद्ध होनेपर अपने स्वरूपसे अक्षर या पर कहा जाता है, तथा हिरण्यगर्भ, अव्याकृत, देवता, जाति, पिण्ड, मनुष्य, तिर्यक्, प्रेत एवं शरीर और इन्द्रियरूप उपाधियोंसे विशिष्ट होकर वह उन्हीं नाम और रूपोंवाला होता है । ऐसा ही “वह चलता है, वह नहीं चलता” इत्यादि श्रुतिमें व्याख्या किया गया है और इस प्रकार “यह तेरा आत्मा”, “यह समस्त भूतोंका अन्तरात्मा है”, “यह समस्त भूतोंमें छिपा हुआ है”, “वह तू है”, “मैं ही यह सब हूँ”, “यह सब आत्मा ही है”, “इससे भिन्न कोई द्रष्टा नहीं है” इत्यादि श्रुतियोंसे विरोध नहीं रहता । दूसरे प्रकारकी कल्पनाओंमें इन श्रुतियोंकी संगति नहीं लगती । |