बृहदारण्यकोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)
Brihadaranyaka Upanishad with Shankara Bhashya
आदि शङ्कराचार्य द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)
पृष्ठ 797, कुल 1402 में से
संदर्भ में पढ़ें| ब्राह्मण ९ ] | शाङ्करभाष्यार्थ | ७८७ |
|---|
| देवा॒नां त्री च॒ त्रीणि॑ च श॒तानि॑; पुन॒रप्ये॒वं त्रय॑श्च, त्री च सह॒स्रा सह॒स्राणि॑—एतावन्तो देवा इति शाकल्योऽप्योमिति होवाच।<br><br>एवमेषां मध्यमा संख्या सम्यक्तया ज्ञाता, पुनस्तेषामेव देवानां संकोचविषयां संख्यां पृच्छति—कतमेव देवा याज्ञवल्क्येति; त्रयस्त्रिंशत्; षट्, त्रयः, द्वौ, अध्यर्धः, एक इति। देवतासंकोचविकासविषयां संख्यां पृष्ट्वा पुनः संख्येयस्वरूपं पृच्छति—कतमे ते त्रयश्च त्री च शता त्रयश्च त्री च सहस्रेति ॥ १ ॥ | तीन हैं और तीन सौ हैं। तथा इसी प्रकार वे तीन और तीन सहस्र हैं। यानी सम्पूर्ण देव इतने हैं। इसपर शाकल्यने भी 'ठीक है' ऐसा कहा।<br><br>इस प्रकार इनकी मध्यमा संख्याका ठीक-ठीक पता लग गया। फिर शाकल्य उन्हीं देवताओंकी संकोचविषयिणी संख्या पूछता है, 'हे याज्ञवल्क्य ! देव कितने हैं?' तब याज्ञवल्क्य क्रमशः 'तैंतीस, छः, तीन, दो, डेढ़ और एक' ऐसा बतलाते हैं। इस प्रकार देवताओंके संकोच और विकासविषयक संख्या पूछकर फिर संख्येयके स्वरूपके विषयमें पूछता है, 'वे तीन और तीन सौ तथा तीन और तीन सहस्र देव कौन-से हैं?' ॥ १॥ |
तैंतीस देवताओंका विवरण
स होवाच महिमान एवैषामेते त्रयस्त्रिँशत्त्वेव देवा इति कतमे ते त्रयस्त्रिँशदित्यष्टौ वसव एकादश रुद्रा द्वादशादित्यास्त एकत्रिँशदिन्द्रश्चैव प्रजापतिश्च त्रयस्त्रिँशाविति ॥ २ ॥
उस याज्ञवल्क्यने कहा, 'ये तो इनकी महिमाएँ ही हैं। देवगण तो तैंतीस ही हैं।' [ शाकल्य—] 'वे तैंतीस देव कौन-से हैं?' [ याज्ञवल्क्य—] 'आठ वसु, ग्यारह रुद्र, बारह आदित्य—ये इकतीस देवगण हैं तथा इन्द्र और प्रजापतिके सहित तैंतीस हैं' ॥ २ ॥