भारतकोश
बृहदारण्यकोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)

बृहदारण्यकोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)

Brihadaranyaka Upanishad with Shankara Bhashya

आदि शङ्कराचार्य द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished1,402 पृष्ठ

पृष्ठ 798, कुल 1402 में से

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पृष्ठ 798
७८८बृहदारण्यकोपनिषद्[ अध्याय ३

स होवाचेतरः—महिमानो विभूतयः, एषां त्रयस्त्रिंशतः देवानाम् एते त्रयश्च त्री च शतेत्यादयः; परमार्थतस्तु त्रयस्त्रिंशच्चैव देवा इति । कतमे ते त्रयस्त्रिंशदित्युच्यते—अष्टौ वसवः एकादश रुद्राः, द्वादश आदित्यास्ते एकत्रिंशत्, इन्द्रश्चैव प्रजापतिश्च त्रयस्त्रिंशाविति त्रयस्त्रिंशतः पूरणौ ॥ २ ॥इसपर इतर (याज्ञवल्क्य) ने कहा—ये तीन और तीन सौ आदि देवगण इन तैंतीस देवताओंकी महिमा—विभूति ही हैं। वस्तुतः तो तैंतीस ही देवगण हैं, वे तैंतीस देवगण कौन-से हैं? सो बतलाया जाता है-आठ वसु, ग्यारह रुद्र और बारह आदित्य-ये इकतीस हुए तथा इन्द्र और प्रजापति—ये तैंतीसकी पूर्ति करनेवाले हैं॥२॥

वसु कौन हैं ?

कतमे वसव इत्यग्निश्च पृथिवी च वायुश्चान्तरिक्षं चादित्यश्च द्यौश्च चन्द्रमाश्च नक्षत्राणि चैते वसव एतेषु हीदँ सर्वँ हितमिति तस्माद्वसव इति ॥ ३ ॥

[ शाकल्य-] 'वसु कौन हैं?' [याज्ञवल्क्य-] 'अग्नि, पृथिवी, वायु, अन्तरिक्ष, आदित्य, द्युलोक, चन्द्रमा और नक्षत्र—ये वसु हैं; इन्हींमें यह सब जगत् निहित है, इसीसे ये वसु हैं' ॥ ३ ॥

कतमे वसव इति तेषां स्वरूपं प्रत्येकं पृच्छ्यते; अग्निश्च पृथिवी चेति—अग्न्याद्या नक्षत्रान्ता एते वसवः—प्राणिनां कर्मफलाश्रयत्वेन कार्यकारणसंघातरूपेण तन्निवासत्वेन च विपरिणमन्तो जगदिदं सर्वं वासयन्ति वसन्ति'वसु कौन है ?' इस प्रकार उनमेंसे प्रत्येकका स्वरूप पूछा जाता है । अग्निश्च पृथिवी च'—इस प्रकार अग्निसे लेकर नक्षत्रपर्यन्त ये सब वसु हैं । प्राणियोंके कर्मफलके आश्रय होकर उनके निवासस्थान देहेन्द्रियसंघातरूपसे विपरिणामको प्राप्त होकर इस सम्पूर्ण जगत्को बसाये हुए हैं और स्वयं भी बसते हैं; [ यह
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