भारतकोश
बृहदारण्यकोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)

बृहदारण्यकोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)

Brihadaranyaka Upanishad with Shankara Bhashya

आदि शङ्कराचार्य द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished1,402 पृष्ठ

पृष्ठ 799, कुल 1402 में से

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पृष्ठ 799

ब्राह्मण ९] शाङ्करभाष्यार्थ ७८९

च; ते यस्माद् वासयन्ति तस्माद् वसव इति ॥ ३ ॥उनका वसुत्व है]। वे चूँकि [दूसरोंको अपनेमें] बसाये हुए हैं, इसलिये वसु हैं ॥ ३ ॥

रुद्र कौन हैं ?

कतमे रुद्रा इति दशेमे पुरुषे प्राणा आत्मैकादशस्ते यदास्माच्छरीरान्मर्त्यादुत्क्रामन्त्यथ रोदयन्ति तद्यद्रोदयन्ति तस्माद्रुद्रा इति ॥ ४ ॥

[ शाकल्य—] ‘रुद्र कौन हैं?’ [ याज्ञवल्क्य—] ‘पुरुषमें ये दश प्राण (इन्द्रियाँ) और ग्यारहवां आत्मा (मन)। ये जिस समय इस मरणशील शरीरसे उत्क्रमण करते हैं, उस समय रुलाते हैं; अतः उत्क्रमणकालमें चूँकि अपने सम्बन्धियोंको रुलाते हैं; इसलिये रोदनके कारण होनेसे] ‘रुद्र’ कहलाते हैं’ ॥ ४ ॥

कतमे रुद्रा इति। दशेमे पुरुषे कर्मबुद्धीन्द्रियाणि प्राणाः, आत्मा मन एकादशः—एकादशानां पूरणः; ते एते प्राणा यदा अस्माच्छरीरान्मर्त्यात् प्राणिनां कर्मफलोपभोगक्षये उत्क्रामन्ति—अथ तदा रोदयन्ति तत्सम्बन्धिनः। तत्तत्र यस्माद्रोदयन्ति ते सम्बन्धिनः, तस्माद् रुद्रा इति ॥ ४ ॥‘रुद्र कौन हैं ? [याज्ञवल्क्य—] ‘इस पुरुषमें कर्मेन्द्रिय और ज्ञानेन्द्रिय—ये दश प्राण और ग्यारहवाँ आत्मा—मन, जो ग्यारहकी पूर्ति करनेवाला है। वे ये प्राण जिस समय प्राणियोंके कर्मफलोपभोगका क्षय हो जानेपर इस मरणशील शरीरसे उत्क्रमण करते हैं, उस समय ये उसके सम्बन्धियोंको रुलाते हैं। उस समय चूँकि ये सम्बन्धियोंको रुलाते हैं, इसलिये रोदनमें निमित्त होनेसे रुद्र कहलाते हैं’ ॥ ४ ॥