बृहदारण्यकोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)
Brihadaranyaka Upanishad with Shankara Bhashya
आदि शङ्कराचार्य द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)
पृष्ठ 796, कुल 1402 में से
संदर्भ में पढ़ें| ७८६ | बृहदारण्यकोपनिषद् | [ अध्याय ३ |
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ने ] 'ठीक है' ऐसा कहा और पूछा, 'याज्ञवल्क्य ! कितने देव हैं?' [ याज्ञवल्क्य—] 'डेढ़।' [ शाकल्यने ] 'ठीक है' ऐसा कहा, और पूछा, 'याज्ञवल्क्य ! कितने देव हैं?' [ याज्ञवल्क्य—] 'एक।' [ शाकल्यने ] 'ठीक है' ऐसा कहा और पूछा, 'वे तीन और तीन सौ तथा तीन और तीन सहस्र देव कौन-से हैं?' ॥ १ ॥
| अथ हैनँ विदग्ध इति नामतः शकलस्यापत्यं शाकल्यः पप्रच्छ—कतिसंख्याका देवा हे याज्ञवल्क्येति। स याज्ञवल्क्यः, ह किल, एतयैव वक्ष्यमाणया निविदा प्रतिपेदे संख्याम्, यां संख्यां पृष्टवाञ्शाकल्यः। यावन्तो यावत्संख्याका देवा वैश्वदेवस्य शस्त्रस्य निविदि—निविन्नाम देवतासंख्यावाचकानि मन्त्रपदानि, कानिचिद् वैश्वदेवे शस्त्रे शस्यन्ते तानि निवित्संज्ञकानि; तस्यां निविदि यावन्तो देवाः श्रूयन्ते तावन्तो देवा इति। <br><br> का पुनः सा निविदिति तानि निवित्पदानि प्रदर्श्यन्ते—त्रयश्च त्री च शता—त्रयश्च देवाः, | फिर इस याज्ञवल्क्यसे विदग्ध इस नामवाले शाकल्य—शकलके पुत्रने पूछा, 'हे याज्ञवल्क्य ! देवगण कितनी संख्यावाले हैं?' उस याज्ञवल्क्यने, जो संख्या शाकल्यने पूछी थी उस संख्याका इस आगे बतलायी जानेवाली निविद्से निरूपण किया। जितने—जितनी संख्यावाले देवता विश्वेदेवसम्बन्धी शस्त्रकी निविद् (मन्त्र-पद) में बताये गये हैं (उतने सब देव हैं), निविद् कहते हैं देवताओंकी संख्या बतानेवाले मन्त्रपदोंको, विश्वेदेव-सम्बन्धी शस्त्रमें देवसंख्याप्रतिपादक कुछ मन्त्रपदोंका उपदेश किया गया है, वे सब 'निविद्' कहलाते हैं। अतः तात्पर्य यह है कि उस निविद्में जितने देवगण श्रुतिद्वारा बताये जाते हैं, उतने ही कुल देवता हैं। <br><br> किंतु वह निविद् क्या है? वे निविद्के पद दिखलाये जाते हैं—'त्रयश्च त्री च शता' अर्थात् देवगण |