बृहदारण्यकोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)
Brihadaranyaka Upanishad with Shankara Bhashya
आदि शङ्कराचार्य द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)
पृष्ठ 795, कुल 1402 में से
संदर्भ में पढ़ेंब्राह्मण ९ ] शाङ्करभाष्यार्थ [ ७८५
| सद्द्वारेणाधिगन्तव्ये इति तदर्थं<br>शाकल्यब्राह्मणमारभ्यते— | ज्ञान प्राप्त करना है, इसीलिये<br>शाकल्यब्राह्मण आरम्भ किया<br>जाता है— |
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देवताओंकी संख्या
अथ हैनँ विदग्धः शाकल्यः पप्रच्छ कति देवा याज्ञवल्क्येति स हैतयैव निविदा प्रतिपेदे यावन्तो वैश्वदेवस्य निविद्युच्यन्ते त्रयश्च त्री च शता त्रयश्च त्री च सहस्रेत्योमिति होवाच कत्येव देवा याज्ञवल्क्येति त्रयस्त्रिꣳशदित्योमिति होवाच कत्येव देवा याज्ञवल्क्येति षडित्योमिति होवाच कत्येव देवा याज्ञवल्क्येति त्रय इत्योमिति होवाच कत्येव देवा याज्ञवल्क्येति द्वावित्योमिति होवाच कत्येव देवा याज्ञवल्क्येत्यध्यर्ध इत्योमिति होवाच कत्येव देवा याज्ञवल्क्येत्येक इत्योमिति होवाच कतमे ते त्रयश्च त्री च शता त्रयश्च त्री च सहस्रेति ॥ १ ॥
इसके पश्चात् इस याज्ञवल्क्यसे शाकल्य विदग्धने पूछा, 'हे याज्ञवल्क्य ! कितने देवगण हैं ?' तब याज्ञवल्क्यने इस आगे कही जानेवाली निविद्से ही उनकी संख्याका प्रतिपादन किया । 'जितने वैश्वदेवकी निविद्में अर्थात् देवताओंकी संख्या बतानेवाले मन्त्रपदोंमें बतलाये गये हैं । वे तीन और तीन सौ तथा तीन और तीन सहस्र (तीन हजार तीन सौ छः) हैं ।' [तब शाकल्यने] 'ठीक है' ऐसा कहा । फिर पूछा, 'याज्ञवल्क्य ! कितने देव हैं?' याज्ञवल्क्यने कहा, 'तैंतीस' । [ शाकल्यने ] 'ठीक है' ऐसा कहा और पूछा, 'तो, याज्ञवल्क्य ! कितने देव हैं ?' [ याज्ञवल्क्य— ] 'छः ।' [शाकल्यने] 'ठीक है' ऐसा कहा और फिर पूछा, 'याज्ञवल्क्य ! कितने देव हैं ?' [ याज्ञवल्क्य— ] 'तीन !' [ शाकल्यने ] 'ठीक है' ऐसा कहा और पुनः पूछा, 'याज्ञवल्क्य ! कितने देव हैं ?'[याज्ञवल्क्य—] 'दो ।' [शाकल्य-
बृ० उ० ५०—