भारतकोश
बृहदारण्यकोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)

बृहदारण्यकोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)

Brihadaranyaka Upanishad with Shankara Bhashya

आदि शङ्कराचार्य द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished1,402 पृष्ठ

पृष्ठ 728, कुल 1402 में से

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पृष्ठ 728
७१८बृहदारण्यकोपनिषद्[ अध्याय ३

| मनोऽधिकरणौ; तथा शरीराधिकरणौ जरां मृत्युं चात्येति; जरेति कार्यकरणसङ्घातविपरिणामो वलीपालितादिलिङ्गः; मृत्युरिति तद्विच्छेदो विपरिणामावसानः; तौ जरामृत्यू शरीराधिकरणावत्येति । | इन दोनोंका अधिकरण मन है, इनको तथा शरीर जिनका अधिकरण है, उन जरा और मृत्युको भी आत्मा अतिक्रमण किये हुए है। जरा—यह देहेन्द्रियसङ्घातका विपरिणाम है, झुर्रियाँ पड़ जाना, बाल पक जाना आदि इसके चिह्न हैं तथा मृत्यु शरीरका विच्छेद और विपरिणामका अन्त हो जाना है; उन शरीररूप अधिकरणवाले जरामृत्युका वह अतिक्रमण किये हुए है। | | ये तेऽशनायादयः प्राणमनःशरीराधिकरणा प्राणिष्वनवरतं वर्तमाना अहोरात्रादिवत् समुद्रोर्मिवच्च प्राणिषु संसार इत्युच्यन्ते, योऽसौ दृष्टेर्द्रष्टेत्यादिलक्षणः साक्षादव्यवहितोऽपरोक्षादगौणः सर्वान्तर आत्मा ब्रह्मादिस्तम्बपर्यन्तानां भूतानामशनायापिपासादिभिः संसारधर्मैः सदा न स्पृश्यते; आकाश इव घनादिमलैः । | ये जो प्राण, मन और शरीररूप अधिकरणवाले तथा प्राणियोंमें दिन-रात और समुद्रकी तरङ्गोंके समान निरन्तर रहनेवाले क्षुधादि धर्म हैं, वे ही प्राणियोंमें 'संसार' इस नामसे कहे जाते हैं; किंतु यह जो दृष्टिका द्रष्टा आदि लक्षणोंवाला, साक्षात्—अव्यवहित और अपरोक्ष—अगौण सर्वान्तर—ब्रह्मासे लेकर स्थावरपर्यन्त समस्त भूतोंका आत्मा है, वह मेघादि मलोंसे आकाशके समान कभी संसारधर्मोंसे स्पर्श नहीं किया जाता। | | [विदुषो व्युत्थान-निरूपणम्]<br>तमेतं वै आत्मानं स्वं तत्त्वं विदित्वा ज्ञात्वा अयमहमस्मि परं ब्रह्म सदा सर्वसंसारविनिर्मुक्तं नित्य- | उस इस आत्मा—स्वरूपको यह सर्वदा सम्पूर्ण संसारधर्मोंसे रहित नित्यतृप्त परब्रह्म मैं हूँ—ऐसा जानकर ब्राह्मणलोग—क्योंकि |

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