भारतकोश
बृहदारण्यकोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)

बृहदारण्यकोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)

Brihadaranyaka Upanishad with Shankara Bhashya

आदि शङ्कराचार्य द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished1,402 पृष्ठ

पृष्ठ 727, कुल 1402 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 727
ब्राह्मण ५ ]शाङ्करभाष्यार्थ७१७

| मूढैः अशनायापिपासादिमद्ब्रह्म गम्यमानमपि क्षुधितोऽहं पिपासितोऽहमिति, ते अत्येत्येव परमार्थतः । ताभ्यामसंस्पृष्टस्वभावत्वात्; "न लिप्यते लोकदुःखेन बाह्यः" (क० उ० २ । २ । ११) इति श्रुतेः—अविद्वल्लोकाध्यारोपितदुःखेनेत्यर्थः । प्राणैकधर्मत्वात् समासकरणमशनायापिपासयोः ।<br><br>शोकं मोहम्—शोक इति कामः; इष्टं वस्तूद्दिश्य चिन्तयतो यदरमणम्, तत्तृष्णाभिभूतस्य कामबीजम्; तेन हि कामो दीप्यते; मोहस्तु विपरीतप्रत्ययप्रभवोऽविवेको भ्रमः, स चाविद्या सर्वस्यानर्थस्य प्रसवबीजम्; भिन्नकार्यत्वात्तयोः शोकमोहयोरसमासकरणम् । तौ | यद्यपि मूढलोग 'मैं भूखा हूँ, मैं प्यासा हूँ, ऐसा मानकर ब्रह्मको भूख-प्याससे युक्त समझते हैं तो भी उनसे असंस्पृष्ट स्वभाववाला होनेके कारण वह परमार्थतः उनका अतिक्रमण ही किये हुए है; इस विषयमें "वह लोकदुःखसे लिप्त नहीं होता, उससे बाह्य है" ऐसी श्रुति भी है। तात्पर्य यह है कि वह अविद्वान् पुरुषोंद्वारा आरोपित दुःखसे लिप्त नहीं होता। एक प्राणके ही धर्म होनेके कारण 'अशनाया' और 'पिपासा' पदोंका समास किया गया है।<br><br>'शोकं मोहम्' इनमें शोक यह काम है; इष्ट वस्तुके लिये चिन्तन करनेवालेका जो अरमण (खेद) है, वह तृष्णाभिभूत पुरुषके कामका बीज होता है; क्योंकि उससे काम उत्तेजित होता है; मोह विपरीत प्रतीतिसे होनेवाला अविवेक यानी भ्रम है; यही समस्त अनर्थोंकी उत्पत्तिकी बीजभूता अविद्या है;¹ शोक और मोहके कार्य भिन्न हैं, इसलिये इनका समास नहीं किया गया। |


१ योगदर्शनमें अविद्याका लक्षण इस प्रकार किया है—'अनित्याशुचिदुःखानात्मसु नित्यशुचिसुखात्मख्यातिरविद्या' अर्थात् अनित्य, अशुचि, दुःख और अनात्मामें नित्य, शुचि, सुख और आत्मबुद्धि होना अविद्या है—यही विपरीत प्रतीति है।