भारतकोश
बृहदारण्यकोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)

बृहदारण्यकोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)

Brihadaranyaka Upanishad with Shankara Bhashya

आदि शङ्कराचार्य द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished1,402 पृष्ठ

पृष्ठ 726, कुल 1402 में से

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पृष्ठ 726
७१६बृहदारण्यकोपनिषद्[ अध्याय ३
संस्कृत-भाष्यहिन्दी-अनुवाद
इति श्रुतेः। न च नामरूपव्यवहारकाले त्वविवेकिनां क्रियाकारकफलादिसंव्यवहारो नास्तीति प्रतिषिध्यते। तस्माज्ज्ञानाज्ञाने अपेक्ष्य सर्वः संव्यवहारः शास्त्रीयो लौकिकश्च; अतो न काचन विरोधशङ्का। सर्ववादिनामप्यपरिहार्यः परमार्थसंव्यवहारकृतो व्यवहारः।होता है और नाम-रूप व्यवहारकालमें अविवेकियोंकी दृष्टिमें भी क्रिया, कारक और फलादिका सम्यक् व्यवहार नहीं होता—ऐसा प्रतिषेध भी नहीं किया जाता। अतः शास्त्रीय और लौकिक सारा ही व्यवहार ज्ञान और अज्ञानकी अपेक्षासे हे; इसलिये इसमें विरोधकी कोई शङ्का नहीं हो सकती। परमार्थ और संव्यवहारकृत व्यवहार तो सभी वादियोंके लिये अपरिहार्य है।
तत्र परमार्थात्मस्वरूपमपेक्ष्य- <br><br> प्रश्नः पुनः—कतमो याज्ञवल्क्य सर्वान्तर इति।अब, पारमार्थिक आत्मस्वरूपकी अपेक्षासे ही पुनः प्रश्न किया जाता है, 'हे याज्ञवल्क्य ! वह सर्वान्तर आत्मा कौन-सा है?'
(परमार्थात्मस्वरूपनिरूपणम्) <br><br> प्रत्याहेतरः—योऽशनायापिपासे, अशितुमिच्छाशनाया, पातुमिच्छा पिपासा; ते अशनायापिपासे योऽत्येतीति वक्ष्यमाणेण सम्बन्धः, अविवेकिभिस्तलमलवदिव गगनं गम्यमानमेव तलमले अत्येति परमार्थतः; ताभ्यामसंस्पृष्टस्वभावत्वात्। तथाइसपर याज्ञवल्क्यने कहा—'जो अशनाया-पिपासा—अशनकी इच्छा अशनाया है और पीनेकी इच्छा पिपासा—उन अशनाया और पिपासाको जो अतिक्रमण किये हुए है—इस प्रकार इसका आगेसे सम्बन्ध है; अविवेकी पुरुष आकाशको तलमलादियुक्त मानते हैं, तो भी वस्तुतः वह उनसे अछूते स्वभाववाला होनेके कारण तलमलको अतिक्रमण किये हुए है। इसी प्रकार