बृहदारण्यकोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)

बृहदारण्यकोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)
Brihadaranyaka Upanishad with Shankara Bhashya
आदि शङ्कराचार्य द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)
DevanagariSanskritpublished1,402 पृष्ठ
पृष्ठ 729, कुल 1402 में से
संदर्भ में पढ़ेंपृष्ठ 729
| ब्राह्मण ५ ] | शाङ्करभाष्यार्थ | ७१९ |
|---|
| संस्कृत मूल / भाष्य | भाष्यार्थ |
|---|---|
| वृत्तामिति, ब्राह्मणाः ब्राह्मणानाम् एवाधिकारो व्युत्थाने, अतो ब्राह्मणग्रहणम्, व्युत्थाय वैपरीत्येन उत्थानं कृत्वा; कुत इत्याह— | व्युत्थान (संन्यास) में ब्राह्मणोंका ही अधिकार है, इसलिये यहाँ ‘ब्राह्मण’ पद ग्रहण किया गया है— ‘व्युत्थाय’ विपरीतभावसे उत्थान करके, कहाँसे उत्थान करके ? सो बताते हैं— |
| पुत्रैषणायाः पुत्रार्थैषणा पुत्रैषणा—पुत्रेणेमं लोकं जयेयमिति लोकजयसाधनं पुत्रं प्रतीच्छा—एषणा दारसङ्ग्रहः । दारसङ्ग्रहमकृत्वेत्यर्थः— | पुत्रैषणासे, पुत्रके लिये जो एषणा (इच्छा) होती है, उसे पुत्रैषणा कहते हैं—मैं पुत्रके द्वारा यह लोक जीतूँगा, इसलिये लोकजयके साधन पुत्रके प्रति जो इच्छा होती है वही पुत्रैषणा है; यहाँ ‘एषणा’ से स्त्रीपरिग्रह लक्षित होता है। भाव यह कि स्त्रीसंग्रह न करके— |
| वित्तैषणायाश्च—कर्मसाधनस्य गवादेरुपादानम्—अनेन कर्म कृत्वा पितृलोकं जेष्यामीति, विद्यासंयुक्तेन वा देवलोकम्, केवलया वा हिरण्यगर्भविद्यया दैवेन वित्तेन देवलोकम् । | तथा वित्तैषणासे उत्थान करके, कर्मके साधनभूत गौ आदि मानुष-वित्तको इस भावसे ग्रहण करना कि इसके द्वारा कर्म करके मैं पितृलोकपर विजय प्राप्त करूँगा अथवा विद्यासंयुक्त कर्मसे देवलोक या केवल हिरण्यगर्भविद्यारूप देववित्तसे देवलोक प्राप्त करूँगा, [ इसका नाम वित्तैषणा है ] । |
| दैवाद् वित्ताद् व्युत्थानमेव नास्तीति केचित्, यस्मात्तद्बलेन हि किल व्युत्थानमिति; तदसत्, “एतावान्वै कामः” (बृ० उ० १ । ४ । १७) इति | किन्हीं-किन्हींका मत है कि दैव-वित्तसे तो व्युत्थान होता ही नहीं, क्योंकि उसके बलसे ही तो व्युत्थान होता है; किंतु यह ठीक नहीं है, क्योंकि “एतावान्वै कामः” इस |