भारतकोश
बृहदारण्यकोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)

बृहदारण्यकोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)

Brihadaranyaka Upanishad with Shankara Bhashya

आदि शङ्कराचार्य द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished1,402 पृष्ठ

पृष्ठ 305, कुल 1402 में से

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पृष्ठ 305

ब्राह्मण ४ ] शाङ्करभाष्यार्थ २९९


संस्कृत-भाष्यम्भाषार्थ
यत्त्वेन क्रियत इत्यत आह—<br><br>अथेति पूर्वपक्षविनिवृत्त्यर्थः; यः कश्चित्, ह वै अस्मात्सांसारिकात्पिण्डग्रहणलक्षणादविद्याकामकर्महेतुकादग्न्यधीनकमीभिमानतया वा ब्राह्मणजातिमात्रकर्माभिमानतया वा आगन्तुकादस्वभूताल्लोकात्, स्वं लोकमात्माख्यम् आत्मत्वेनाव्यभिचारित्वात्, अदृष्ट्वा—'अहं ब्रह्मास्मि' इति, प्रैति म्रियते; स यद्यपि स्वो लोकः, अविदितोऽविद्यया व्यवहितोऽस्व इवाज्ञातः, एनम्—सङ्ख्यापूरण इव लौकिक आत्मानम्—न भुनक्ति न पालयति शोकमोहभयादिदोषापनयेन ।करनेकी आवश्यकता है ? इसपर श्रुति कहती है—यहाँ 'अथ' यह पद पूर्वपक्षकी निवृत्तिके लिये है। [ क्या कहती है—] जो कोई भी इस अविद्याकामकर्मजनित तथा अग्न्यधीन कर्माभिमानके कारण अथवा ब्राह्मणजातिमात्रके कर्माभिमानके कारण आगन्तुक पिण्डग्रहणरूप सांसारिक अनात्मभूतलोकसे, अपने 'आत्मा' संज्ञक लोकको, जो आत्मस्वरूप होनेके कारण अव्यभिचारी है, 'मैं ब्रह्म हूँ' इस प्रकार न देखकर ( न जानकर ) चला जाता अर्थात् मर जाता है, वह यद्यपि स्वलोक है, तो भी अविदित—अविद्यासे व्यवहित अर्थात् अस्वलोकके समान अज्ञात रहनेपर, लौकिक दृष्टान्तमें दशम संख्याकी पूर्तिके समान, इस आत्माका शोक, मोह एवं भय आदि दोषोंकी निवृत्तिद्वारा भरण यानी पालन नहीं करता।
यथा च लोके वेदोऽननुक्तोऽनधीतः कर्माद्यवबोधकत्वेन न भुनक्ति, अन्यद्वा लौकिकं कृष्यादि कर्म अकृतं स्वात्मनानानभिव्यञ्जितम् आत्मीयफलप्रदानेन न भुनक्ति, एवमात्मा स्वो लोकःतथा लोकमें जिस प्रकार अननुक्त—बिना अध्ययन किया हुआ वेद कर्मादिके अवबोधकरूपसे पालन नहीं करता एवं अन्य कृषि आदि लौकिक कर्म अकृत यानी अपने स्वरूपसे अभिव्यक्त न होनेपर अपने फलप्रदानके द्वारा पालन नहीं करता, उसी प्रकार स्वलोक आत्मा अपने