बृहदारण्यकोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)
Brihadaranyaka Upanishad with Shankara Bhashya
आदि शङ्कराचार्य द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)
पृष्ठ 304, कुल 1402 में से
संदर्भ में पढ़ें| २९८ | बृहदारण्यकोपनिषद् | [अध्याय १ |
|---|
| तदसत्, अविद्याधिकारे कर्माधिकारार्थं वर्णविभागस्य प्रस्तुतत्वात्, परेण च विशेषणात्; <br><br>यदि ह्यत्र लोकशब्देन पर एवात्मोच्येत, परेण विशेषणमनर्थकं स्यात् 'स्वं लोकमदृष्ट्वा' इति। | करते हैं।' किंतु यह अर्थ ठीक नहीं है, क्योंकि वर्णविभागका प्रस्ताव अविद्याके प्रकरणमें कर्माधिकारका निरूपण करनेके लिये किया गया है, इसके सिवा आगेके वाक्यमें 'स्वम्' ऐसा विशेषण दिया है; यदि यहाँ 'लोक' शब्दसे परमात्मा ही कहा जाय तो 'स्व लोकमदृष्ट्वा' इस आगेके वाक्यमें 'स्वम्' यह विशेषण निरर्थक होगा। | | स्वलोकव्यतिरिक्तश्चेदग्न्यधीनतया प्रार्थ्यमानः प्रकृतो लोकः, ततः स्वम् इति युक्तं विशेषणम्, प्रकृतपरलोकनिवृत्त्यर्थत्वात्; स्वत्वेन चाव्यभिचारात्परमात्मलोकस्य, अविद्याकृतानां च स्वत्वव्यभिचारात्। ब्रवीति च कर्मकृतानां व्यभिचारम्— 'क्षीयत एव' इति। | यदि अग्निकी अधीनतासे प्रार्थना किया जानेवाला प्रकृत लोक स्वलोकसे भिन्न हो तभी 'स्वम्' यह विशेषण प्रस्तुत परलोककी निवृत्तिके लिये होनेके कारण सार्थक होगा; क्योंकि स्वरूपसे परमात्मलोकका तो व्यभिचार (भेद) है नहीं, केवल अविद्याकृत लोकोंका ही व्यभिचार है। आगेके 'क्षीयत एव' इस वाक्यसे श्रुति कर्मजनित लोकोंका स्वलोकसे व्यभिचार बतलाती है। | | ब्रह्मणा सृष्टा वर्णाः कर्मार्थम्; तच्च कर्म धर्माख्यं सर्वानैव कर्तव्यतया नियन्तृ पुरुषार्थसाधनं च। तस्मात्तेनैव चेत्कर्मणा स्वो लोकः परमात्माख्योऽविदितोऽपि प्राप्यते, किं तस्यैव पदनी- | ब्रह्मने कर्म करनेके लिये वर्णोंकी रचना की थी। वह धर्मसंज्ञक कर्म कर्तव्यरूपसे सभीका नियन्ता और पुरुषार्थका साधन है। अतः यदि उसी कर्मसे परमात्म-संज्ञक स्वलोक अज्ञात होनेपर भी प्राप्त हो जाता है तो फिर प्राप्तव्यरूपसे उसीके लिये और क्या |