बृहदारण्यकोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)

बृहदारण्यकोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)
Brihadaranyaka Upanishad with Shankara Bhashya
आदि शङ्कराचार्य द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)
DevanagariSanskritpublished1,402 पृष्ठ
पृष्ठ 303, कुल 1402 में से
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ब्राह्मण ४] शाङ्करभाष्यार्थ २९७
| मूल संस्कृत | हिन्दी अनुवाद |
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| दिनिमित्तक्रियापेक्षा, किं तर्हि ? जातिमात्रस्वरूपप्रतिलम्भेनैव पुरुषार्थसिद्धिः । यत्र तु देवाधीना पुरुषार्थसिद्धिः, तत्रैवाग्न्यादि-सम्बद्धक्रियापेक्षा । स्मृतेश्च—<br><br>“जप्येनैव तु संसिद्ध्येद्ब्राह्मणो नात्र संशयः ।<br>कुर्यादन्यन्न वा कुर्यान्मैत्रो ब्राह्मण उच्यते ॥”<br>(मनु० २ । ८७) इति । | अपेक्षा नहीं है; तो फिर क्या बात है ? वहाँ ब्राह्मणमें अर्थात् ब्राह्मण-जातिमात्रका स्वरूप प्राप्त कर लेने-पर पुरुषार्थसिद्धि हो जाती है। जहाँ पुरुषार्थकी सिद्धि देवाधीन होती है, वहीं अग्नि आदिसे सम्बन्ध रखनेवाले कर्मोंकी अपेक्षा होती है। यही बात स्मृतिसे भी सिद्ध होती है—<br><br>“इसमें संदेह नहीं, ब्राह्मण अन्य [अग्न्यादिसम्बन्धी] कर्म करे अथवा न करे जपसे ही पूर्ण सिद्धि प्राप्त कर लेता है। मित्र (सूर्य)-देवतासम्बन्धी गायत्री मन्त्रका जप करनेके कारण अथवा सम्पूर्ण भूतोंको मित्रकी भाँति अभय देने-वाला होनेसे ब्राह्मण मैत्र कहलाता है।” |
| पारिव्राज्यदर्शनाच्च । तस्माद्ब्राह्मणत्व एव मनुष्येषु लोकं कर्मफलमिच्छन्ति । यस्मादेताभ्यां हि ब्राह्मणाग्निरूपाभ्यां कर्मकर्त्रधिकरणरूपाभ्यां यत्स्रष्टृ ब्रह्म साक्षादभवत् । | इसके सिवा [ब्राह्मणके लिये ही] संन्यासका विधान होनेसे भी [मनुष्यलोकमें उसीकी सर्वोत्कृष्टता सिद्ध होती है।] अतः मनुष्योंमें ब्राह्मणत्वमें ही लोक—कर्मफलकी इच्छा करते हैं; क्योंकि जो साक्षात् सृष्टिकर्ता ब्रह्म था, वह कर्मके कर्ता और अधिकरणरूप ब्राह्मण और अग्नि-इन दो रूपोंसे ही व्यक्त हुआ था। |
| अत्र तु परमात्मलोकमग्नौ ब्राह्मणे चेच्छन्तीति केचित् । | यहाँ कोई-कोई (भर्तृप्रपञ्च आदि) ऐसी व्याख्या करते हैं कि ‘अग्नि [-में हवन करके] और ब्राह्मणमें [उसे दान देकर] परमात्मलोककी इच्छा |