बृहदारण्यकोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)

बृहदारण्यकोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)
Brihadaranyaka Upanishad with Shankara Bhashya
आदि शङ्कराचार्य द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)
DevanagariSanskritpublished1,402 पृष्ठ
पृष्ठ 306, कुल 1402 में से
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| ३०० | बृहदारण्यकोपनिषद् | [ अध्याय १ |
|---|
| संस्कृत-भाष्यम् | हिन्दी-अनुवाद |
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| स्वेनैव नित्यात्मस्वरूपेणानभिव्यञ्जितोऽविद्यादि प्रहाणेन न भुनक्त्येव । | नित्य आत्मस्वरूपसे अभिव्यक्त न होनेपर अविद्यादिके विनाशद्वारा पालन नहीं करता । |
| ननु किं स्वलोकदर्शननिमित्तपरिपालनेन ? कर्मणः फलप्राप्तिध्रौव्यात्, इष्टफलनिमित्तस्य च कर्मणो बाहुल्यात्, तन्निमित्तं पालनमक्षयं भविष्यति । | **शङ्का—**किंतु आत्मलोकके साक्षात्कार (ज्ञान) के कारण होनेवाले परिपालनकी आवश्यकता क्या है ? क्योंकि कर्मके फलकी प्राप्ति तो निश्चित है और इष्ट फलका हेतु होनेवाला कर्म [स्वभावतः] अधिक होता ही है, इसलिये उसके कारण उसका पालन अक्षय हो जायगा। |
| तन्न, कृतस्य क्षयवत्त्वात्; इत्येतदाह—यदिह वै संसारेऽद्भुतवत्कश्चिन्महात्मापि, अनेवंवित्—स्वं लोकं यथोक्तेन विधिना अविद्वान्, महद्बहु अश्वमेधादि पुण्यं कर्म इष्टफलमेव नैरन्तर्येण करोति, 'अनेनैवानन्त्यं मम भविष्यति' इति, तत्कर्म हास्याविद्यावतोऽविद्याजनितकामहेतुत्वात् स्वप्नदर्शनविभ्रमोद्भूतविभूतिवदन्ततोऽन्ते फलोपभोगस्य क्षीयत एव । | **समाधान—**ऐसी बात नहीं है, क्योंकि किया जानेवाला कर्म क्षीण होनेवाला होता है। इसीसे श्रुति ऐसा कहती है—जो कोई इस संसारमें, चाहे वह आश्चर्य-जैसा महात्मा भी हो, इस प्रकार न जाननेवाला अर्थात् आत्मलोकको उपर्युक्त रीतिसे जाननेवाला नहीं है, वह इस विचारसे कि मुझे अनन्तत्वकी प्राप्ति होगी निरन्तर महान् अर्थात् बहुत-से इष्ट फल देनेवाले अश्वमेधादि पुण्य-कर्म भी करे तो भी उस अविद्वान्का वह कर्म अविद्याजनित कामरूप हेतुवाला होनेसे स्वप्नदर्शनरूप भ्रमसे होनेवाले ऐश्वर्यके समान फलोपभोगके अन्तमें क्षीण हो ही जाता है, क्योंकि उसके |