बृहदारण्यकोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)

बृहदारण्यकोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)
Brihadaranyaka Upanishad with Shankara Bhashya
आदि शङ्कराचार्य द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)
DevanagariSanskritpublished1,402 पृष्ठ
पृष्ठ 299, कुल 1402 में से
संदर्भ में पढ़ेंपृष्ठ 299
ब्राह्मण ४ ] शाङ्करभाष्यार्थ २९३
| शाङ्करभाष्यम् | भाष्यार्थ |
|---|---|
| उग्रादप्युग्रम्, यद्धर्मो यो धर्मः; तस्मात्क्षत्रस्यापि नियन्तृत्वाद्धर्मात्परं नास्ति; तेन हि नियम्यन्ते सर्वे। तत्कथम् ? इत्युच्यते—अथो अप्यबलीयान्दुर्बलतरो बलीयांसमात्मनो बलवत्तरमप्याशंसते कामयते जेतुं धर्मेण बलेन; यथा लोके राज्ञा सर्वबलवत्तमेनापि कुटुम्बिकः, एवम्; तस्मात्सिद्धं धर्मस्य सर्वबलवत्तरत्वात्सर्वनियन्तृत्वम्। | और उग्रसे भी उग्र है; 'यद्धर्मः' का अर्थ है जो धर्म; अतः क्षत्रियका भी नियन्ता होनेके कारण धर्मसे उत्कृष्ट कोई नहीं है, क्योंकि उसीके द्वारा सबका नियमन होता है। सो किस प्रकार ? यह बतलाया जाता है—जो अबलीयान् यानी बहुत दुर्बल होता है, वह भी बलीयान्—अपनी अपेक्षा अधिक बलवान्को धर्मरूपी बलके द्वारा जीतना चाहता है, जिस प्रकार लोकमें सबसे बलवान् राजाकी सहायतासे साधारण कुटुम्बी पुरुष अपनेसे अधिक बलवान्का पराभव करना चाहता है, उस प्रकार [ वह धर्मबलसे जीतना चाहता है। ] अतः सबकी अपेक्षा बलवत्तर होनेके कारण धर्म सबका नियन्ता है—यह सिद्ध होता है। |
| यो वै स धर्मो व्यवहारलक्षणो लौकिकैर्व्यवह्रियमाणः सत्यं वै तत्; सत्यमिति यथाशास्त्रार्थता; स एवानुष्ठीयमानो धर्मनामा भवति, शास्त्रार्थत्वेन ज्ञायमानस्तु सत्यं भवति। | वह जो लौकिक पुरुषोंद्वारा व्यवहार किया जानेवाला व्यवहाररूप धर्म है, वह निश्चय सत्य ही है। सत्य शास्त्रानुकूल अर्थका नाम है। वह (शास्त्रानुकूल अर्थ) ही अनुष्ठान किये जानेपर धर्म नामवाला होता है और शास्त्रके तात्पर्यरूपसे ज्ञात होनेपर वही सत्य कहलाता है।¹ |
| यस्मादेवं तस्मात्सत्यं यथाशास्त्रं वदन्तं व्यवहारकाले आहुः | क्योंकि ऐसा है, इसलिये व्यवहारकालमें सत्य यानी शास्त्रानुसार भाषण |
१. अभिप्राय यह है कि ज्ञात होनेवाला शास्त्रका तात्पर्य सत्य है और आचरणमें आनेपर वही धर्म कहलाता है।