बृहदारण्यकोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)
Brihadaranyaka Upanishad with Shankara Bhashya
आदि शङ्कराचार्य द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)
पृष्ठ 298, कुल 1402 में से
संदर्भ में पढ़ें| २९२ | बृहदारण्यकोपनिषद् | [अध्याय १ |
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| सर्वं पुष्यति यदिदं किञ्च ॥ १३ ॥ | यह जो कुछ है, उस सबका यही पोषण करती है ॥ १३ ॥ |
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धर्मकी उत्पत्ति और उसके प्रभाव एवं स्वरूपका वर्णन
स नैव व्यभवत्तच्छ्रेयोरूपमत्यसृजत धर्मं तदेतत्क्षत्रस्य क्षत्रं यद्धर्मस्तस्माद्धर्मात्परं नास्त्यथो अबलीयान्बलीयाँ२ समाशँ२सते धर्मेण यथा राज्ञैवं यो वै स धर्मः सत्यं वै तत्तस्मात्सत्यं वदन्तमाहुर्धर्मं वदतीति धर्मं वा वदन्तँ२ सत्यं वदतीत्येतद्ध्येवैतदुभयं भवति ॥ १४॥
तब भी वह विभूतियुक्त कर्म करनेमें समर्थ नहीं हुआ। उसने श्रेयोरूप (कल्याणस्वरूप) धर्मकी अतिसृष्टि की। यह जो धर्म है, क्षत्रियका भी नियन्ता है। अतः धर्मसे उत्कृष्ट कुछ नहीं है। इसलिये जिस प्रकार राजाकी सहायतासे [प्रबल शत्रुको भी जीतनेकी शक्ति आ जाती है] उसी प्रकार धर्मके द्वारा निर्बल पुरुष भी बलवान्को जीतनेकी इच्छा करने लगता है। वह जो धर्म है, निश्चय सत्य ही है। इसीसे सत्य बोलनेवालोंको कहते हैं कि ‘यह धर्ममय वचन बोलता है’ तथा धर्ममय वचन बोलनेवालेसे कहते हैं कि ‘यह सत्य बोलता है’, क्योंकि ये दोनों धर्म ही हैं ॥ १४॥
| संस्कृत-भाष्य | हिन्दी-अनुवाद |
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| स चतुरः सृष्ट्वापि वर्णान्नैव व्यभवत्, उग्रत्वात्क्षत्रस्यानियताशङ्कया। तच्छ्रेयोरूपमत्यसृजत, किं तत् ? धर्मम्; तदेतच्छ्रेयोरूपं सृष्टं क्षत्रस्य क्षत्रं क्षत्रस्यापि नियन्तृ, | वह (ब्रह्म) चारों वर्णोंको रचकर भी—क्षत्रियजाति उग्र होती है, इसलिये वह नियन्त्रणमें नहीं रह सकती—इस आशङ्कासे विभूतियुक्त कर्म करनेमें समर्थ नहीं हुआ। तब उसने अतिशयतासे श्रेयोरूप उत्पन्न किया। वह श्रेयोरूप कौन है? धर्म; वह यह रचा हुआ श्रेयोरूप धर्म क्षत्रका भी क्षत्र यानी क्षत्रियका भी नियन्ता है |