बृहदारण्यकोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)

बृहदारण्यकोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)
Brihadaranyaka Upanishad with Shankara Bhashya
आदि शङ्कराचार्य द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)
DevanagariSanskritpublished1,402 पृष्ठ
पृष्ठ 1065, कुल 1402 में से
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ब्राह्मण ४] शाङ्करभाष्यार्थ १०५१
| शाङ्करभाष्य | भाष्यार्थ |
|---|---|
| मानः संसरति। यस्मात् काम- | करनेवाला है वह संसार-बन्धनको |
| यमान एवैवं संसरत्यथ तस्मा- | प्राप्त होता है। चूँकि कामना करने- |
| दकामयमानो न क्वचित् संसरति। | वाला ही इस प्रकार संसरित होता |
| है, इसलिये जो कामना करनेवाला | |
| नहीं है, वह कभी संसार-बन्धनमें | |
| नहीं पड़ता। | |
| फलासक्तस्य हि गतिरुक्ता। | फलासक्तकी गति तो बतला दी |
| अकामस्य हि क्रियानुपपत्तेरका- | गयी; किंतु जो निष्काम है, उसकी |
| मयमानो मुच्यत एव। कथं | क्रिया सम्भव न होनेके कारण |
| पुनरकामयमानो भवति ? यो- | कामना न करनेवाला पुरुष तो मुक्त |
| ऽकामो भवत्यसावकामयमानः। | ही हो जाता है, किंतु जीव कामना |
| कथमकामतत्युच्यते-यो निष्का- | न करनेवाला कैसे होता है ? जो |
| मो यस्मान्निर्गताः कामाः सो- | अकाम होता है, वही कामना न |
| ऽयं निष्कामः। कथं कामा निग- | करनेवाला है। अकामता कैसे होती |
| च्छन्ति ? य आप्तकामो भव- | है? सो बतलाया जाता है—जो |
| त्याप्ताः कामा येन स आप्तकामः। | निष्काम है अर्थात् जिससे कामनाएँ |
| निकल गयी हैं, वह पुरुष निष्काम | |
| कहलाता है। कामनाएँ किस प्रकार | |
| निकल जाती हैं ? जो आप्तकाम होता | |
| है अर्थात् जिसने सब कामनाओंको | |
| प्राप्त कर लिया है, वह आप्तकाम है | |
| [उसकी कामनाएँ नहीं रहतीं]। | |
| कथमाप्यन्ते कामाः ? आत्म- | कामनाओंकी प्राप्ति कैसे होती |
| कामत्वेन। यस्यात्मैव नान्यः | है? आत्मकाम होनेसे। जिसकी |
| कामयितव्यो वस्त्वन्तरभूतः | कामनाका विषय आत्मा ही होता |
| पदार्थो भवति। आत्मैवानन्तरो- | है, कोई अन्य वस्तुरूप पदार्थ नहीं |
| ऽबाह्यः कृत्स्नः प्रज्ञानघन एक- | होता। आत्मा ही अन्तर-बाह्यरहित, |
| पूर्ण प्रज्ञानघन और एकरस है; |