बृहदारण्यकोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)

बृहदारण्यकोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)
Brihadaranyaka Upanishad with Shankara Bhashya
आदि शङ्कराचार्य द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)
DevanagariSanskritpublished1,402 पृष्ठ
पृष्ठ 1067, कुल 1402 में से
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ब्राह्मण ४ ] शाङ्करभाष्यार्थ [ १०५३
| संस्कृत (मूल/भाष्य) | हिन्दी भाष्यार्थ |
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| अभिप्रेतत्वात्। येन चाशनायाद्यतीतो नित्यं प्रत्यवायासम्वद्धो विदित आत्मा, तं वयं ब्रह्मविदं ब्रूमः। नित्यमेव अशनायाद्यतीतमात्मानं पश्यति। यस्माच्च जिहासितव्यमन्यदुपादेयं वा यो न पश्यति, तस्य कर्म न शक्यत एव सम्बन्धुम्, यस्त्वब्रह्मवित्तस्य भवत्येव प्रत्यवायपरिहारार्थं कर्मेति न विरोधः। अतः कामाभावादकामयमानो न जायते, मुच्यत एव।<br><br>तस्यैवमकामयमानस्य कर्माभावे गमनकारणाभावात् प्राणा वागादयः, नोत्क्रामन्ति नोर्ध्वं क्रामन्ति देहात्। स च विद्वानाप्तकाम आत्मकामतयैहैव ब्रह्मभूतः। सर्वात्मनो हि ब्रह्मणो दृष्टान्तत्वेन प्रदर्शितमेतद्रूपम्—"तद्वा अस्यैतदाप्तकाममात्मकाममकामं रूपम्" (बृ० उ० ४।३।२१) इति। | योग्य पदार्थ ही माना गया है। ब्रह्मवेत्ता तो हम उसे कहते हैं, जिसने आत्माको क्षुधादिसे अतीत और प्रत्यवायसे असम्बद्ध जाना है। वह सर्वदा क्षुधादिसे अतीत आत्माको ही देखता है; क्योंकि जो आत्मासे भिन्न किसी हेय या उपादेय वस्तुको नहीं देखता उससे कर्मका सम्बन्ध होना सम्भव ही नहीं है; जो ब्रह्मवेत्ता नहीं है, उसीको प्रत्यवायकी निवृत्तिके लिये कर्मकी आवश्यकता है, इसलिये इसमें कोई विरोध नहीं है। अतः कामनाका अभाव होनेके कारण कामना न करनेवाला पुरुष जन्म नहीं लेता, वह मुक्त ही हो जाता है।<br><br>इस प्रकार कामना न करनेवाले उस पुरुषके कर्मोंका अभाव हो जानेके कारण गमनका कोई कारण न रहनेसे उसके वागादि प्राण उत्क्रमण नहीं करते—देहसे ऊपरकी ओर नहीं जाते। और आत्मकामताके कारण आप्तकाम हुआ वह विद्वान् यहीं ब्रह्मभूत हो जाता है। "वह यह निश्चय ही इसका आप्तकाम, आत्मकाम और अकामरूप है" इस प्रकार यह दृष्टान्तरूपसे उस ब्रह्मका ही रूप दिखाया गया है। 'अथा- |