भारतकोश
बृहदारण्यकोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)

बृहदारण्यकोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)

Brihadaranyaka Upanishad with Shankara Bhashya

आदि शङ्कराचार्य द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished1,402 पृष्ठ

पृष्ठ 1068, कुल 1402 में से

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पृष्ठ 1068
१०५४बृहदारण्यकोपनिषद्[ अध्याय ४
संस्कृत-भाष्यम्हिन्दी-अनुवाद
तस्य हि दार्ष्टान्तिकभूतोऽयमर्थ उपसंह्रियतेऽथाकामयमान इत्यादिना ।कामयमानः' इत्यादि वाक्यसे यह उसीके दार्ष्टान्तिकभूत अर्थका उपसंहार किया गया है ।
स कथमेवम्भूतो मुच्यत इत्युच्यते—यो हि सुषुप्तावस्थमिव निर्विशेषमद्वैतमलुप्तचिद्रूपज्योतिःस्वभावमात्मानं पश्यति, तस्यैवाकामयमानस्य कर्माभावे गमनकारणाभावात् प्राणा वागादयो नोत्क्रामन्ति । किंतु विद्वान् स इहैव ब्रह्म, यद्यपि देहवानिव लक्ष्यते, स ब्रह्मैव सन् ब्रह्माप्येति । यस्मान्न हि तस्याब्रह्मत्वपरिच्छेदहेतवः कामाः सन्ति, तस्मादिहैव ब्रह्मैव सन् ब्रह्माप्येति न शरीरपातोत्तरकालम् ।वह इस प्रकारका साधक किस प्रकार मुक्त होता है ? सो कहा जाता है—जो सुषुप्ति-अवस्था में स्थितकी भाँति निर्विशेष, अद्वैत, अलुप्तचिद्रूप ज्योतिःस्वरूप आत्माको देखता है, उस कामना न करनेवाले पुरुषके कर्मोंका अभाव हो जानेके कारण गमनका कोई कारण न रहनेसे उसके वागादि प्राण उत्क्रमण नहीं करते; किंतु वह विद्वान् यहीं ब्रह्मरूप हो जाता है, यद्यपि वह देहवान्-सा दिखायी देता है, किंतु वह ब्रह्म ही रहकर ब्रह्मको प्राप्त होता है; क्योंकि उसके अब्रह्मत्वके परिच्छेदकी हेतुभूता कामनाएँ नहीं रहतीं, इसलिये वह यहीं ब्रह्म ही रहकर ब्रह्मको प्राप्त हो जाता है, शरीरपातके पश्चात् नहीं ।
(मोक्षस्य भावान्तरत्वप्रतिषेधः)<br>न हि विदुषो मृतस्य भावान्तरापत्तिर्जीवतोऽन्यो भावो देहान्तरप्रतिसन्धानाभावमात्रेणैव तु ब्रह्माप्येतीत्युच्यते । भावान्तरापत्तौ हि मोक्षस्य सर्वोपनिषद्विवक्षितोऽर्थ आत्मैकत्वाख्यः समरे हुए विद्वान्‌को भावान्तरकी प्राप्ति नहीं होती अर्थात् उसका जीवितावस्थासे भिन्न भाव नहीं होता, देहान्तरका संयोग न होनेसे ही ‘वह ब्रह्मको प्राप्त होता है' ऐसा कहा जाता है। यदि मोक्ष कोई भावान्तरप्राप्ति मानी जाय तो सम्पूर्ण उपनिषद्‌का विवक्षित जो आत्मैक्यरूप