भारतकोश
बृहदारण्यकोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)

बृहदारण्यकोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)

Brihadaranyaka Upanishad with Shankara Bhashya

आदि शङ्कराचार्य द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished1,402 पृष्ठ

पृष्ठ 1079, कुल 1402 में से

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पृष्ठ 1079

ब्राह्मण ४ ] शाङ्करभाष्यार्थ १०६५


णाय मन्त्र उदाह्रियते श्लोक-शब्दवाच्यः—उसीको दृढ करनेके लिये श्लोक-शब्दवाच्य मन्त्रका उल्लेख किया जाता है—

विद्वान्‌का अनुत्क्रमण

तदेष श्लोको भवति। यदा सर्वे प्रमुच्यन्ते कामा येऽस्य हृदि श्रिताः। अथ मर्त्योऽमृतो भवत्यत्र ब्रह्म समश्नुत इति। तद्यथाहिनिर्ल्वयनी वल्मीके मृता प्रत्यस्ता शयीतैवमेवेदं शरीरं शेतेऽथायमशरीरोऽमृतः प्राणो ब्रह्मैव तेज एव सोऽहं भगवते सहस्रं ददामीति होवाच जनको वैदेहः ॥ ७ ॥

उसी अर्थमें यह मन्त्र है—जिस समय इसके हृदयमें आश्रित सम्पूर्ण कामनाओंका नाश हो जाता है तो फिर यह मरणधर्मा अमृत हो जाता है और यहीं (इस शरीरमें ही) उसे ब्रह्मकी प्राप्ति हो जाती है। इसमें दृष्टान्त—जिस प्रकार सर्पकी कांचुली बाँबीके ऊपर मृत और सर्पद्वारा परित्यक्त हुई पड़ी रहती है, उसी प्रकार यह शरीर पड़ा रहता है और यह अशरीर अमृत प्राण तो ब्रह्म ही है—तेज ही है। तब विदेहराज जनकने कहा, 'वह मैं जनक श्रीमान्‌को सहस्र गौएँ देता हूँ' ॥ ७ ॥

तत् तस्मिन्नेवार्थे एष श्लोको मन्त्रो भवति। यदा यस्मिन् काले सर्वे समस्ताः कामाः तृष्णाप्रभेदाः प्रमुच्यन्ते, आत्मकामस्य ब्रह्मविदः समूलतो विशीर्यन्ते, ये प्रसिद्धा लोके इहामुत्रार्थाः पुत्रवित्तलोकैषणालक्षणा अस्य प्रसिद्धस्य पुरुषस्य हृदि बुद्धौ श्रिता'तत्'—उसी अर्थमें यह श्लोक यानी मन्त्र है—जब—जिस समय सर्व अर्थात् समस्त काम—तृष्णाओं के भेद सर्वथा छूट जाते हैं, आत्मकामी ब्रह्मवेत्ताकी वे समस्त कामनाएँ समूल नष्ट हो जाती हैं; जो लोकमें प्रसिद्ध पुत्रैषणा, वित्तैषणा और लोकैषणारूप ऐहिक और पारलौकिक कामनाएं इस पुरुषके हृदय—बुद्धिमें आश्रित हैं [ वे जब