बृहदारण्यकोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)
Brihadaranyaka Upanishad with Shankara Bhashya
आदि शङ्कराचार्य द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)
पृष्ठ 1094, कुल 1402 में से
संदर्भ में पढ़ें१०८० बृहदारण्यकोपनिषद् [अध्याय ४
| कामाय इच्छति, सर्वस्य आत्मभूतत्वात्; अतः किमिच्छन् कस्य कामाय शरीरमनुसंज्वरेत्, भ्रं॑शेत्, शरीरोपाधिकृतदुःखमनु दुःखी स्यात्, शरीरतापमनुतप्येत। <br><br> अनात्मदर्शिनो हि तद् व्यतिरिक्तवस्त्वन्तरेप्सोः। 'ममेदं स्यात्, पुत्रस्य इदम्, भार्याया इदम्' इत्येवमीहमानः पुनःपुनर्जननमरणप्रबन्धरूढः शरीररोगमनु रुज्यते, सर्वात्मदर्शिनस्तु तदसम्भव इत्येतदाह ॥ १२ ॥ | कामनासे वह इच्छा करे, क्योंकि वह तो सबका आत्मस्वरूप हो जाता है। अतः वह क्या इच्छा करता हुआ और किस कामनाके लिये शरीरके पीछे संतप्त—भ्रष्ट हो? अर्थात् शरीररूप उपाधिके दुःखके पीछे दुःखी हो—शरीरके तापसे अनुतप्त हो। <br><br> जो शरीरादि अनात्मोंमें आत्मबुद्धि करनेवाला है, आत्मासे भिन्न वस्तुकी इच्छा करनेवाले उस अनात्मज्ञको ही वह (अनुताप) [हो सकता है]। 'मुझे यह मिल जाय, पुत्रको यह मिल जाय, पत्नीको यह हो जाय' इस प्रकार इच्छा करता हुआ वह पुनः-पुनः जन्म-मरणपरम्परामें पड़ा रहकर शरीरके रोगके पीछे रोगी होता है। किंतु सर्वात्मदर्शीको ऐसा होना असम्भव है—यही बात श्रुति यहाँ बतलाती है ॥ १२ ॥ |
आत्माका महत्त्व
| किं च— | इसके सिवा— |
यस्यानुवित्तः प्रतिबुद्ध आत्मास्मिन् संदेहो गहने प्रविष्टः। स विश्वकृत् स हि सर्वस्य कर्ता तस्य लोकः स उ लोक एव ॥ १३ ॥
इम अनेकों अनर्थोंसे पूर्ण और विवेक-विज्ञानके विरोधी विषम