भारतकोश
बृहदारण्यकोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)

बृहदारण्यकोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)

Brihadaranyaka Upanishad with Shankara Bhashya

आदि शङ्कराचार्य द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished1,402 पृष्ठ

पृष्ठ 1096, कुल 1402 में से

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पृष्ठ 1096
१०८२बृहदारण्यकोपनिषद्[ अध्याय ४
आत्मा उच्यते; तस्य सर्वं आत्मा, स च सर्वस्यात्मेत्यर्थः।<br><br>य एष ब्राह्मणेन प्रत्यगात्मा प्रतिबुद्धतया अनुवित्त आत्मा अनर्थसंकटे गहने प्रविष्टः स न संसारी, किंतु पर एव; यस्माद् विश्वस्य कर्ता सर्वस्य आत्मा, तस्य च सर्वं आत्मा। 'एक एवाद्वितीयः पर एवास्मि' इत्यनुसंधातव्य इति श्लोकार्थः ॥ १३ ॥'लोक' शब्दसे आत्मा कहा गया है। तात्पर्य यह है कि सब आत्मा उसके हैं और वह सबका आत्मा है।<br><br>आत्मा अनर्थपूर्ण और गहन-शरीरमें प्रविष्ट है—इस प्रकार जिस इस प्रत्यगात्माको ब्राह्मणने साक्षात्कारके द्वारा उपलब्ध कर लिया है, वह संसारी जीव नहीं है, अपितु पर ही है; क्योंकि वह विश्वका कर्ता है, सबका आत्मा है और उसीके सब आत्मा हैं। इस मन्त्रका तात्पर्य यह है कि मैं एकमात्र अद्वितीय परात्मा ही हूँ'—ऐसा अनुसन्धान करना चाहिये ॥ १३ ॥

आत्मज्ञानके बिना होनेवाली दुर्गति

किंच—तथा—

इहैव सन्तोऽथ विद्मस्तद्वयं न चेदवेदिर्महती विनष्टिः ।
ये तद्विदुरमृतास्ते भवन्त्यथेतरे दुःखमेवापियन्ति ॥ १४॥

हम इस शरीरमें रहते हुए ही यदि उसे जान लेते हैं [ तो कृतार्थ हो गये ] यदि उसे नहीं जाना तो बड़ी हानि है। जो उसे जान लेते हैं, वे अमृत हो जाते हैं; किंतु दूसरे लोग तो दुःखको ही प्राप्त होते हैं ॥ १४ ॥

इहैव—अनेकानर्थसंकुले मन्तो भवन्तः, अज्ञानदीर्घनिद्रामोहिताः सन्तः, कथंचिदिव ब्रह्मतत्त्वम् आत्मत्वेन अथ विद्मो विजानीमः,यहीं—इस अनेकों अनर्थपूर्ण शरीरमें रहते हुए ही अर्थात् अज्ञानरूप दीर्घ निद्रासे मोहित रहते हुए ही किसी प्रकार यदि हम उस ब्रह्मतत्त्वको—प्रकरण-प्राप्त इस ब्रह्मको आत्मभावसे