बृहदारण्यकोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)

बृहदारण्यकोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)
Brihadaranyaka Upanishad with Shankara Bhashya
आदि शङ्कराचार्य द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)
DevanagariSanskritpublished1,402 पृष्ठ
पृष्ठ 111, कुल 1402 में से
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ब्राह्मण ३ ] शाङ्करभाष्यार्थ [ १०५
| संस्कृत (शाङ्करभाष्य) | हिन्दी भाष्यार्थ |
|---|---|
| वतः शमोपायव्यतिरेकेण किञ्चित्कर्म विहितमुपलभ्यते। कर्मनिमित्तदेवतादिसर्वसाधनविज्ञा- <br><br> नोपमर्देन ह्यात्मज्ञानं विधीयते, <br><br> न चोपमर्दितक्रियाकारकादिविज्ञानस्य कर्मप्रवृत्तिरुपपद्यते। <br><br> विशिष्टक्रियासाधनादिविज्ञानपूर्वकत्वात्क्रियाप्रवृत्तेः। न हि देश- <br><br> कालाद्यनवच्छिन्नास्थूलद्वयादिब्रह्मप्रत्ययधारिणः कर्मावसरोऽस्ति। | स्वरूपका ज्ञान है उसके लिये तो शम (शान्ति) का साधन करनेके सिवा और कोई भी कर्म विहित नहीं देखा जाता, क्योंकि आत्मज्ञान तो कर्मके निमित्तभूत देवतादि सब प्रकारके साधनोंके विज्ञानकी निवृत्ति करके ही होता है और जिसके क्रिया-कारकादि विज्ञानकी निवृत्ति हो गयी है उसकी कर्ममें प्रवृत्ति होनी सम्भव नहीं है; कारण, क्रियाकी प्रवृत्ति तो विशिष्ट क्रिया और साधनादिके विज्ञानपूर्वक ही होती है। जिसकी देश-कालादि-से अनवच्छिन्न, अस्थूल और अद्वयादिस्वरूप ब्रह्मप्रत्ययमें धारणा है उसे तो कर्मका कोई अवसर ही नहीं है। |
| भोजनादिप्रवृत्त्यवसरवत्स्यादिति चेत् ? | पूर्व०—भोजनादिकी प्रवृत्तिके अवसरके समान उसे कर्मका भी अवसर हो सकता है—ऐसा कहें तो ? |
| न, अविद्यादिकेवलदोषनिमित्तत्वाद्भोजनादिप्रवृत्तेरावश्यकत्वानुपपत्तेः। न तु तथानियतं कदाचित्क्रियते कदाचिन्न क्रियते चेति नित्यं कर्मोपपद्यते। केवलदोष- | सिद्धान्ती—नहीं, क्योंकि भोजनादिमें प्रवृत्त होनेकी आवश्यकता केवल अविद्यादि दोषके ही कारण होती हो—ऐसा मानना उचित नहीं है। इसके सिवा भोजनादिके समान नित्य कर्मका, कभी किया जाय और कभी न किया जाय—ऐसा अनियत होना भी सम्भव नहीं है। भोजनादि कर्म केवल क्षुधादि दोषके कारण होते |