भारतकोश
बृहदारण्यकोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)

बृहदारण्यकोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)

Brihadaranyaka Upanishad with Shankara Bhashya

आदि शङ्कराचार्य द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished1,402 पृष्ठ

पृष्ठ 114, कुल 1402 में से

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पृष्ठ 114
१०८बृहदारण्यकोपनिषद्[ अध्याय १

द्वारा देवगण हमारा अतिक्रमण करेंगे। अतः उन्होंने उसके पास जाकर उसे पापसे विद्ध कर दिया। यह वाक् जो अननुरूप (निषिद्ध) भाषण करती है वही वह पाप है, वही वह पाप है ॥ २ ॥

| ते देवा हैवं विनिश्चित्य, वाचं वागभिमानिनीं देवतामूचु-रुक्तवन्तः। त्वं नोऽस्मभ्यमुद्गा-यौद्गात्रं कर्म कुरुष्व। वाग्देवता-निर्वर्त्यमौद्गात्रं कर्म दृष्टवन्तः, तामेव च देवतां जपमन्त्राभिधेयाम् “असतो मा सद्गमय” (बृ० उ० १।३।२८) इति। अत्र चोपासनायाः कर्मणश्च कर्तृत्वेन वागादय एव विवक्ष्यन्ते। कस्मात्? यस्मात्परमार्थतस्तत्-कर्तृकस्तद्विषय एव च सर्वो ज्ञानकर्मसंव्यवहारः। वक्ष्यति हि “ध्यायतीव लेलायतीव” इत्यात्मकर्तृत्वाभावं विस्तरतः षष्ठे। | उन देवताओंने ऐसा निश्चय कर वाक्—वाक्‌के अभिमानी देवतासे कहा, “तुम हमारे लिये उद्गान यानी उद्गाताका कर्म करो।” उन्होंने औद्गात्रकर्मको वाग्देवतासे ही सम्पन्न होने योग्य देखा और उसी देवताको “मुझे असत्‌से सत्‌के प्रति ले जा” इस जपमन्त्रका भी अभिधेय जाना। यहाँ भी उपासना और कर्मके कर्तारूपसे वागादि ही विवक्षित हैं। क्यों? क्योंकि ज्ञान और कर्मसम्बन्धी सारा व्यवहार वस्तुतः उन्हींसे होनेवाला और उन्हींका विषय है। छठे अध्यायमें “मानो ध्यान करता है, मानो चेष्टा करता है” इत्यादि श्रुति विस्तारपूर्वक उस (व्यवहार) की आत्मकर्तृकता (आत्माके द्वारा किये जाने) का अभाव बतलावेगी। | | इहापि चाध्यायान्ते उपसंहरि-ष्यति अव्याकृतादिक्रियाकारक-फलजातम् “त्रयं वा इदं नाम रूपं कर्म” (१।६।१) इति अविद्या-विषयम्। अव्याकृतात्तु यत्परं | यहाँ भी अध्यायकी समाप्तिमें “त्रयं वा इदं नाम रूपं कर्म” इस वाक्यद्वारा अव्याकृतादि क्रिया, कारक और फलसमूह अविद्याके ही विषय हैं—इस प्रकार श्रुति उपसंहार करेगी। तथा अव्याकृतसे |