बृहदारण्यकोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)
Brihadaranyaka Upanishad with Shankara Bhashya
आदि शङ्कराचार्य द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)
पृष्ठ 1144, कुल 1402 में से
संदर्भ में पढ़ें११३० बृहदारण्यकोपनिषद् [ अध्याय ४
| ह—प्रव्रजिष्यन् पारिव्राज्यं करिष्यन् वै अरे मैत्रेयि । अस्मात् स्थानाद् गार्हस्थ्यादहमस्मि भवामि । मैत्रेयि अनुजानीहि माम्, हन्त इच्छसि यदि, ते अनया कात्यायन्या अन्तं करवाणि—इत्यादि व्याख्यातम् । २। | कहा, 'अरी मैत्रेयि ! मैं इस गार्हस्थ्य-आश्रमसे प्रव्रजन--पारिव्राज्य (संन्यास) स्वीकार करनेवाला हूँ। सो हे मैत्रेयि ! तू मुझे अपनी अनुमति दे, और यदि तेरी इच्छा हो तो इस कात्यायनीके साथ तेरा बँटवारा कर दूँ'--इत्यादि वाक्यकी व्याख्या पहले की जा चुकी है ॥ २ ॥ |
सा होवाच मैत्रेयी यन्नु म इयं भगोः सर्वा पृथिवी वित्तेन पूर्णा स्यात् स्यां न्वहं तेनामृताऽहो ३ नेति नेति होवाच याज्ञवल्क्यो यथैवोपकरणवतां जीवितं तथैव ते जीवितँ् स्यादमृतत्वस्य तु नाशास्ति वित्तेनेति ॥ ३ ॥
उस मैत्रेयीने कहा, 'भगवन् ! यदि यह धनसे सम्पन्न सारी पृथिवी मेरी हो जाय तो क्या मैं उससे अमर हो सकती हूँ, अथवा नहीं ?' याज्ञवल्क्यने कहा, 'नहीं, भोग सामग्रियोंसे सम्पन्न मनुष्योंका जैसा जीवन होता है, वैसा ही तेरा जीवन हो जायगा, धनसे अमृतत्वकी तो आशा है नहीं' ॥ ३ ॥
मैत्रेयीका अमृतत्व-साधनविषयक प्रश्न
सा होवाच मैत्रेयी येनाहं नामृता स्यां किमहं तेन कुर्यां यदेव भगवान् वेद तदेव मे ब्रूहीति ॥४॥
उस मैत्रेयीने कहा, 'जिससे मैं अमर नहीं हो सकती, उसे लेकर मैं क्या करूँगी ? श्रीमान् जो कुछ अमृतत्वका साधन जानते हों, वही मुझे बतलावें' ॥ ४ ॥