बृहदारण्यकोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)
Brihadaranyaka Upanishad with Shankara Bhashya
आदि शङ्कराचार्य द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)
पृष्ठ 1151, कुल 1402 में से
संदर्भ में पढ़ें| ब्राह्मण ५ ] | शाङ्करभाष्यार्थ | ११३७ |
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व्याख्या, मन्त्रोंकी व्याख्या, इष्ट (यज्ञ), हुत (हवन किया हुआ), आशित (खिलाया हुआ), पायित (पिलाया हुआ) यह लोक, परलोक और सम्पूर्ण भूत हैं, सब इसीके निःश्वास हैं ॥ ११ ॥ वह [पाँचवाँ] दृष्टान्त ऐसा है कि जिस प्रकार समस्त जलोंका समुद्र एक अयन [प्रलयस्थान] है, इसी प्रकार समस्त स्पर्शोंका त्वचा एक अयन है, इसी प्रकार समस्त गन्धोंका दोनों नासिकाएँ एक अयन है, इसी प्रकार समस्त रसोंका जिह्वा एक अयन है, इसी प्रकार समस्त रूपोंका चक्षु एक अयन है, इसी प्रकार समस्त शब्दोंका श्रोत्र एक अयन है, इसी प्रकार समस्त संकल्पोंका मन एक अयन है, इसी प्रकार समस्त विद्याओंका हृदय एक अयन है, इसी प्रकार समस्त कर्मोंका दोनों हाथ एक अयन है, इसी प्रकार समस्त आनन्दोंका उपस्थ एक अयन है, इसी प्रकार समस्त विसर्गोंका पायु एक अयन है, इसी प्रकार समस्त मार्गोंका दोनों चरण एक अयन है और इसी प्रकार समस्त वेदोंका वाक् एक अयन है ॥ १२ ॥
| चतुर्थे शब्दनिश्र्वासेनैव लोकाद्यर्थनिश्र्वासः सामर्थ्यादुक्तो भवतीति पृथङ् नोक्तः । इह तु सर्वशास्त्रार्थोपसंहार इति कृत्वा- र्थप्राप्तोऽप्यर्थः स्पष्टीकर्तव्य इति पृथगुच्यते ॥ ११-१२ ॥ | चतुर्थ प्रपाठक [अर्थात् द्वितीय 'अध्याय] में शब्द-निःश्वासके द्वारा ही सामर्थ्यसे लोकादि अर्थनिःश्वास भी कह दिये गये—ऐसा विचार कर उन्हें अलग नहीं कहा। किंतु यहाँ तो सारे शास्त्रका उपसंहार करना है, इसलिये अर्थतः प्राप्त विषयको भी स्पष्ट कर देना चाहिये, इसीलिये उन्हें अलग कहा गया है ॥ ११-१२ ॥ |
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१. द्वितीय अध्यायके चतुर्थ ब्राह्मणका दसवाँ मन्त्र भी इसी प्रकार है, परंतु वहाँ 'व्याख्यानानि' तक कहा है। ये सब शब्दमय निःश्वास हैं। यहाँ 'इष्टं हुतं...सर्वाणि च भूतानि' इतना पाठ अधिक है। ये सब अर्थरूप निःश्वास हैं। अतः वहाँ शब्दनिश्र्वासोंसे ही अर्थनिःश्वासोंका भी उपलक्षण समझना चाहिये।
बृ० उ० ७२—