भारतकोश
बृहदारण्यकोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)

बृहदारण्यकोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)

Brihadaranyaka Upanishad with Shankara Bhashya

आदि शङ्कराचार्य द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished1,402 पृष्ठ

पृष्ठ 1153, कुल 1402 में से

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पृष्ठ 1153

ब्राह्मण ५ ] शाङ्करभाष्यार्थ [ ११३९

अरेऽहं मोहं ब्रवीम्यविनाशी वा अरेऽयमात्मानुच्छित्तिधर्मा ॥ १४ ॥

वह मैत्रेयी बोली, 'यहीं श्रीमान्‌ने मुझे मोहको प्राप्त करा दिया है। मैं इसे विशेषरूपसे नहीं समझती।' उन्होंने कहा, 'अरी मैत्रेयी! मैं मोहकी बात नहीं कह रहा हूँ। अरी! यह आत्मा निश्चय ही अविनाशी और अनुच्छेदरूप धर्मवाला है' ॥ १४ ॥

| सा होवाचात्रैव मा भगवान् तस्मिन्नेव वस्तुनि प्रज्ञानघन एव न प्रेत्य संज्ञा अस्ति, इति मोहान्तं मोहमध्यमापीपिपत्—आपीपदद् अवगमितवानसि संमोहितवानसीत्यर्थः। अतो न वा अहमिममात्मानमुक्तलक्षणं विजानामि विवेकत इति ।<br><br>स होवाच नाहं मोहं ब्रवीम्यविनाशी वा अरेऽयमात्मा। यतो विनष्टुं शीलमस्येति विनाशी न विनाश्यविनाशी, विनाशशब्देन विक्रिया, अविनाशीत्यविक्रिय आत्मेत्यर्थः। अरे मैत्रेय्ययमात्मा प्रकृतोऽनुच्छित्तिधर्मा—उच्छित्तिरुच्छेदः, उच्छेदोऽन्तो विनाशः, उच्छित्तिधर्मोऽस्येत्यु- | वह बोली—यहीं इस प्रज्ञानघनके विषयमें ही, 'मरनेपर इसकी संज्ञा नहीं रहती' ऐसा कहकर श्रीमान्‌ने मुझे मोहमें—मोहके बीचमें 'आपीपिपत्' प्राप्त करा दिया है, अर्थात् मुझे संमोहित कर दिया है। अतः इस उपर्युक्त लक्षणवाले आत्माको मैं विवेकपूर्वक नहीं समझती।<br><br>उन्होंने कहा—मैं मोहकी बात नहीं कहता, क्योंकि हे मैत्रेयि! यह आत्मा अविनाशी है। जिसका विनष्ट होनेका स्वभाव हो उसे विनाशी कहते हैं, जो विनाशी न हो वह अविनाशी कहलाता है, विनाश शब्दसे विकार सूचित होता है, अतः आत्मा अविनाशी अर्थात् अविकारी है। अरी मैत्रेयि! यह आत्मा, जिसका प्रकरण है, अनुच्छित्तिधर्मा है—उच्छित्ति उच्छेदको कहते हैं, उच्छेद—अन्त अर्थात् विनाश, उच्छित्ति जिसका धर्म हो उसे |