बृहदारण्यकोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)
Brihadaranyaka Upanishad with Shankara Bhashya
आदि शङ्कराचार्य द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)
पृष्ठ 116, कुल 1402 में से
संदर्भ में पढ़ें| ११० | बृहदारण्यकोपनिषद् | [ अध्याय १ |
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| तं भोगं सा त्रिषु पवमानेषु कृत्वा अवशिष्टेषु नवसु स्तोत्रेषु वाचनिकमार्त्विज्यं फलं यत्कल्याणं शोभनं वदति वर्णान्भिनिर्वर्तयति तद् आत्मने मह्यमेव। तद्ध्यसाधारणं वाग्देवतायाः कर्म यत्सम्यग्वर्णानामुच्चारणम्। अतस्तदेव विशेष्यते यत्कल्याणं वदतीति। यत्तु वदनकार्यं सर्वसंघातोपकारात्मकं तद्याजमानमेव। | उस भोगको तीन पवमानोंमें करके उसने शेष नौ स्तोत्रोंमें जो ऋत्विक्-सम्बन्धी वाचनिक¹ फल था अर्थात् वह जो कल्याण यानी सुन्दर भाषण—वर्णोच्चारण करती थी उसे अपने लिये अर्थात् यह मेरे लिये ही हो—इस प्रकार गान किया। ⁕ वर्णोंका जो ठीक-ठीक उच्चारण है यही वाग्देवताका असाधारण कर्म है। अतः 'यत्कल्याणं वदति' इस वाक्यद्वारा उसीको विशेष्यरूपसे बतलाया गया है। तथा समस्त संघातका उपकारक जो भाषणकार्य है वह यजमानसम्बन्धी ही है। | | तत्र कल्याणवदनात्मसम्बन्धासङ्गावसरं देवताया रन्ध्रं प्रतिलभ्य ते विदुरसुराः, कथम्? अनेनोद्गात्रा नोऽस्मान्स्वाभाविकं ज्ञानं कर्म चाभिभूयातीत्य शास्त्रजनितकर्मज्ञानरूपेण ज्योतिषोद्गा- | तब, कल्याणवदनका मेरेसे सम्बन्ध है—इस प्रकारके अभिनिवेशका अवसररूप वाग्देवताका छिद्र देखकर उन असुरोंने जाना; क्या जाना? इस उद्गानकर्मद्वारा ये हमें अर्थात् स्वाभाविक ज्ञान और कर्मको दबाकर उद्गातारूप शास्त्रजनित कर्म-ज्ञानरूप ज्योतिसे हमारा |
१. "अथात्मनेऽन्नाद्यमागायेत्"—इसके पश्चात् अपने लिये भक्ष्यरूप अन्नका आगान करे—इस वचनद्वारा श्रुत जो ऋत्विजोंका फल था।
⁕ ज्योतिष्टोममें बारह स्तोत्र हैं। उनमेंसे 'पवमान' नामक तीन स्तोत्रोंसे यजमानके फलका सम्पादन कर शेष नौ स्तोत्रोंसे उसने कल्याणवदनका सामर्थ्य अपने लिये गान किया।